Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रामास्य मनसो रूपं न किंचिदपि दृश्यते ।
नाममात्रादृते व्योम्नो यथा शून्यजडाकृतेः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे
श्रीरामचन्द्रजी, जैसे शून्य ओर जड आकारवाले भूताकाश का नाममात्र के सिवा कोई रूप
नहीं है, वैसे ही शून्य ओर जड आकारवाले इस मन का कोई भी रूप नहीं दिखाई देता ।
अतएव मन के कार्य सम्पूर्णं पदार्थो में “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" इत्यादि श्रुति से
प्रतिपादित मिथ्यात्व की उपपत्ति होती है, यह भाव हे