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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 48–58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 48–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 48-58

संस्कृत श्लोक

नहि दृश्यादृते किंचिन्मनसो रूपमस्ति हि । दृश्यं चोत्पन्नमेवैतन्नेति वक्ष्याम्यहं पुनः ॥ ४८ ॥ यथा कमलबीजान्तः स्थिता कमलवल्लरी । महाचित्परमाण्वन्तस्तथा दृश्यं जगत्स्थितम् ॥ ४९ ॥ प्रकाशस्य यथाऽऽलोको यथा वातस्य चापलम् । यथा द्रवत्वं पयसि दृश्यत्वं द्रष्टरीदृशम् ॥ ५० ॥ अङ्गदत्वं यथा हेम्नि मृगनद्यां यथा जलम् । भित्तिर्यथा स्वप्नपुरे तथा द्रष्टरि दृश्यधीः ॥ ५१ ॥ एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमनन्यदिव यत्स्थितम् । तदप्युन्मार्जयाम्याशु त्वच्चित्तादर्शतो मलम् ॥ ५२ ॥ यद्द्रष्टुरस्याद्रष्टृत्वं दृश्याभावे भवेद्वलात् । तद्विद्धि केवलीभावं तत एवासतः सतः ॥ ५३ ॥ तत्तामुपगते भावे रागद्वेषादिवासनाः । शाम्यन्त्यस्पन्दिते वाते स्पन्दनक्षुब्धता यथा ॥ ५४ ॥ असंभवति सर्वस्मिन्दिग्भूम्याकाशरूपिणि । प्रकाश्ये यादृशं रूपं प्रकाशस्यामलं भवेत् ॥ ५५ ॥ त्रिजगत्त्वमहं चेति दृश्येऽसत्तामुपागते । द्रष्टुः स्यात्केवलीभावस्तादृशो विमलात्मनः ॥ ५६ ॥ अनाप्ताखिलशैलादि प्रतिबिम्बे हि यादृशी । स्याद्दर्पणे दर्पणता केवलात्मस्वरूपिणी ॥ ५७ ॥ अहं त्वं जगदित्यादौ प्रशान्ते दृश्यसंभ्रमे । स्यात्तादृशी केवलता स्थिते द्रष्टर्यवीक्षणे ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य से अतिरिक्त मन का कुछ भी स्वरूप नहीं है, यदि उत्पन्न दृश्य ही अविद्या और मन है, तो उनकी अनादिता कैसी ? इस पर कहते हैं । यह दृश्य उत्पन्न ही नहीं हुआ है, ऐसा मैं आगे कहूँगा । जैसे कमलगट्टे के अन्दर कमल लता स्थित रहती है, वैसे ही महाचैतन्यरूप परमाणु के अन्दर यह जगत्‌ स्थित है । जैसे प्रकाश का आलोक स्वभाव है, जैसे वायु का चांचल्य स्वभाव है और जैसे जल का द्रवत्व स्वभाव हे, वैसे ही द्रष्टा में दृश्यत्व है । जैसे सुवर्ण में केयूरत्व है, जैसे मृगतृष्णा में जल है और जैसे स्वाप्निक नगर में भित्ति हे, वैसे ही द्रष्टा में दृश्यबुद्धि है । इस प्रकार द्रष्टा में जो दृष्यत्व अभिन्‍न-सा स्थित है, उसको भी (उस मल को भी) तुम्हारे चित्तरूपी दर्पण से शीघ्र निवृत्त करता हूँ । दृश्य का अभाव होने पर इस ब्रष्टामें जो अद्रष्टता बलात्‌ प्राप्त होती है, उसी को सन्मात्र चिद्रूप से अवशिष्ट आत्मा का केवली भाव जानो । चित्त के केवल्यज्ञान द्वारा केवलीभाव को प्राप्त होने पर जैसे वायु के स्पन्दनरहित होने पर वन, जलाशय आदि में वायु-स्पन्दनप्रयुक्त चंचलता शान्त हो जाती है, वैसे ही केवलीभावापन्न मनमें राग, द्वेष आदि वासनाएँ शान्त हो जाती हैं । प्रकाश्य दिशा, भूमि, आकाश आदि सम्पूर्ण पदार्थो के न रहने पर जैसे प्रकाशका शुद्ध स्वरूप ही अवशिष्ट रहता है, वैसे ही तीनों जगत्‌, त्वम्‌, अहम्‌, इत्यादि दृश्यों के रहनेपर विमलस्वरूप द्रष्टा का केवली भाव ही रहता है । जिसमें सम्पूर्ण पर्वत आदि का प्रतिबिम्ब नहीं पडा है, ऐसे दर्पण में जैसे केवल आत्मस्वरूपभूत दर्पणता ही रहती है, वैसे ही त्वम्‌, अहम्‌, यह जगत्‌ इत्यादि दृश्य भ्रम के शान्त होने पर दृश्योन्मुखताशून्य द्रष्टा में केवलता ही रहती हे