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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

संकल्पनं मनो विद्धि संकल्पात्तन्न भिद्यते । यथो द्रवत्वात्सलिलं तथा स्पन्दो यथानिलात् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

भाव यह कि निराकार चित्‌ का जो पदार्थाकार अध्यास है, वही मन है । सामान्य वृत्तियों से उसका लक्षण कहकर असाधारण वृत्ति से भी उसका लक्षण कहते हैं । हे श्रीरामजी, संकल्प को ही आप मन जानिये । जैसे द्रवत्व से जल का और जैसे वायु से स्पन्द का भेद नहीं किया जा सकता । वैसे ही संकल्प से मन का भेद नहीं किया जा सकता