Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 1–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 1–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 1-9
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
कथयत्येवमुद्दामवचने मुनिनायके ।
श्रोतुमेकरसे जाते जने मौनमुपस्थिते ॥ १ ॥
शान्तेषु किङ्किणीजालरवेषु स्पन्दनं विना ।
पञ्जरान्तरहारीतशुकेष्वप्यस्तकेलिषु ॥ २ ॥
सुविस्मृतविलासासु स्थितासु ललनास्वपि ।
चित्रभित्ताविव न्यस्ते समस्ते राजसद्मनि ॥ ३ ॥
मुहूर्तशेषमभवद्दिवसं मधुरातपम् ।
व्यवहारा रविकरैः सह तानवमाययुः ॥ ४ ॥
ववुरुत्फुल्लकमलप्रकरामोदमांसलाः ।
वायवो मधुरस्पन्दाः श्रवणार्थमिवागताः ॥ ५ ॥
श्रुतं चिन्तयितुं भानुरिवाहोरचनाभ्रमम् ।
तत्याजैकान्तमगमच्छून्यमस्तगिरेस्तटम् ॥ ६ ॥
उत्तस्थुर्मिहिकारम्भसमता वनभूमिषु ।
विज्ञानश्रवणादन्तःशीतलाः शान्तता इव ॥ ७ ॥
बभूवुरल्पसंचारा जना दशसु दिक्ष्वपि ।
सावधानतया श्रोतुमिव संत्यक्तचेष्टिताः ॥ ८ ॥
छाया दीर्घत्वमाजग्मुर्वासिष्ठं वचनक्रमम् ।
इव श्रोतुमशेषाणां वस्तूनां दीर्घकन्धराः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चौथा सर्ग
मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी के उपदेश को सुनने के उपरान्त सभा का विसर्जन,
रात्रिके कृत्य, प्रातःकाल पुनः सभा में आगमन तथा चित्त के स्वभाव का वर्णन ।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : वत्स भरद्वाज, जब कि महामुनि श्रीवसिष्ठजी अपनी ज्ञानगर्भित
एवं उत्कृष्ठ वाणी से यों उपदेश दे रहे थे, उनके उपदेशको सुनने के लिए सब लोग
एकाग्रचित्त और मौन साधे थे । उपदेश सुनने में सब लोग ऐसे लीन हो रहे थे कि किसीका
कोई अवयव हिलता-डुलता ही न था, अतएव आभूषणों में लगे हुए घुँधरूओं का शब्द
शान्त था; पिंजड़े में बैठे सुग्गे, कबूतर, आदि पक्षियोंनें भी अपनी स्वाभाविक क्रीडा
(चहकना आदि) छोड़ दी थी विलासपरायण रमणियाँ अपने हाव, भाव आदि विलासों को
भूलकर प्रस्तरप्रतिमाओंकी नाईं बैठी थीं। राजभवनमें रहनेवाले सभी प्राणी चित्रभित्ति में
लिखे हुए चित्र की नाई निश्चल होकर बैठे थे । केवल दो घड़ी दिन शेष रह गया था, उस
समय का प्रकाश बड़ा भला लगता था। जैसे-जैसे सूर्य की किरणें कम होती जाती थीं
वैसे-वैसे लोग भी अपना दैनिक कामकाज कम कर रहे थे । मानों महर्षि के उपदेश को
सुनने के लिए आई हुई, विकसित कमलों की सुगन्धि से सराबोर, मन्द-मन्द सायंकाल की
शीतल वायु बह रही थी । महर्षिजीसे जो उपदेश सुना था, मानों उसको मननपूर्वक खूब
अभ्यस्त करने के लिए सूर्य दिन की रचना के लिए स्वीकृत अपने भ्रमण का परित्याग कर
जनशून्य एकान्त अस्ताचल के शिखर को चले गये थे। ज्ञानगर्भित उपदेश के सुननेसे
उत्पन्न हुई अन्तःकरणको शीतल करनेवाली शान्ति के समान वनभूमियों में तुषारपात से
अविषमता हो गई थी । भाव यह कि तुषार गिरने से सम्पूर्ण व्यापार छोड़ दिये थे। उस समय
सभी वस्तुओं की छाया लम्बी हो गई जिससे मालूम होता था कि सभी वस्तुओंकी छाया
अपनी गर्दन ऊँची कर मानों श्रीवसिष्ठजी के उपदेश को सुन रही हैं