Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 41–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 41,42

संस्कृत श्लोक

मध्ये यदेतदर्थस्य प्रतिभानं प्रथां गतम् । सतो वाप्यसतो वापि तन्मनो विद्धि नेतरत् ॥ ४१ ॥ यदर्थप्रतिभानं तन्मन इत्यभिधीयते । अन्यन्न किंचिदप्यस्ति मनो नाम कदाचन ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि परमार्थरूप से मन है ही नहीं, तथापि शास्त्रीय व्यवहार के लिए कल्पित उसका रूप कहते हैं। प्रत्यक्षस्थल में सामने विद्यमान और स्मरण आदि परोक्षस्थलमें अविद्यमान पदार्थ का जो दृश्यरूप-भान सब लोगों को होता है, वही मन है। जो पदार्थ का भान होता है, वही मन कहा जाता है, उससे अतिरिक्त मन नामक कोई भी वस्तु कदापि नहीं है