Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
सत्यमस्त्वथवाऽसत्यं पदार्थप्रतिभासनम् ।
तावन्मात्रं मनो विद्धि तद्ब्रह्मैव पितामहः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि चित्से संवलित वृत्ति ही पदार्थभान कहा जाता है, ऐसी परिस्थिति में
चित् के सत्य होने पर चिद्घटित मन कैसे मिथ्या है ? तो इस पर कहते हैं।
पदार्थभान मिथ्याविषयाकार होने से मिथ्या अथवा चित्संवलित होने से सत्य आपकी
विवक्षा के अनुसार भले ही हो, इसमें हमारा कुछ भी आग्रह नहीं है मन केवल संकल्परूप
ही है । जैसे संकल्परूप मन है, वैसे ही मन की समष्टि भी संकल्पस्वभाव ही है, वही
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है