Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 39–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 39,40
संस्कृत श्लोक
न बाह्ये नापि हृदये सद्रूपं विद्यते मनः ।
सर्वत्रैव स्थितं चैतद्विद्धि राम यथा नभः ॥ ३९ ॥
इदमस्मात्समुत्पन्नं मृगतृष्णाम्बुसंनिभम् ।
रूपं तु क्षणसंकल्पाद्द्वितीयेन्दुभ्रमोपमम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
मन की आकाशतुल्यता का ही उपपादन करते है ।
हे रामजी, प्रस्तावित मन क्या बाहर ओर क्या हृदय में कहीं पर भी सद्रूप से विद्यमान नहीं
है । किंतु, जैसे आकाश सर्वत्र विद्यमान है, वैसे ही इसको भी सर्वत्र स्थित जानो । मृगतृष्णा में
(प्यासे मृगो को मरुस्थल में सूर्य की किरणों में) प्रतीत होनेवाले जलकी नाई मिथ्या वह
जगत् मन से उत्पन्न हुआ हे । इसका स्वरूप क्षणभर के संकल्प से दूसरे चन्द्रमा के भ्रम की
नाई भ्रमात्मक ही हे अर्थात् भ्रमज्ञान ही उसका आकार है