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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verse 61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्य दृश्यपिशाचस्य शान्त्यै मन्त्रमिमं श्रृणु । रामात्यन्तमयं येन मृतिमेष्यति नङक्ष्यति ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि जगत्‌ असरत्‌ है, तथापि अविद्या से वह सत्‌-सा प्रतीत होता है। केवलीभाव का साक्षात्कार होने से अविद्या की निवृत्ति हो जानेपर वैसा भ्रम नहीं होता, यह गूढ अभिप्राय है । पहले जीवन्मुक्ति पानेवाले पुरुषों के अनुभवरूप प्रमाण से तथा अनिर्मोक्ष की आपत्ति से दृश्य में सत्यताविश्वास को निवृत्त कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी विवर्तवाद का आश्रय कर बोले : हे रामजी, इस दृश्यरूपी पिशाच के विनाश के लिए, इस मन्त्र को सुनो, जिससे चेतनरूप से अभिमत देहरूपी यह पिशाच सर्वथा मर जायेगा और अचेतनरूप से अभिमत अन्तःकरण आदिरूप यह नष्ट हो जायेगा