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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 59–60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 59–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 59,60

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । सच्चेन्न शाम्यत्येवेदं नाभावो विद्यते सतः । असत्तां च न विद्मोऽस्मिन्दृश्ये दोषप्रदायिनि ॥ ५९ ॥ तस्मात्कथमियं शाम्येद्ब्रह्मन्दृश्यविषूचिका । मनोभवभ्रमकरी दुःखसंततिदायिनी ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, यह दृश्य यदि सत्‌ है, तो इसकी निवृत्ति नहीं हो सकेगी, क्योकि सत्‌ की कभी निवृत्ति नहीं हो सकती । दुःखदायी दुश्यकी असत्ता हम लोगों को प्रतीत नहीं होती, इसलिए यह दृश्यरूपी महामारी कैसे शान्त होगी ? दुश्यरूपी महामारी मन से जन्म आदि भ्रम को उत्पन्न करनेवाली ओर दुःखपरम्परा को देनेवाली हे