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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 23–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 23–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 23-37

संस्कृत श्लोक

भानोर्भासा भूषितैर्मेघलेशैः किंचित्किंचित्कुङ्कुमच्छाययेव । पाश्चात्त्योऽद्रिः पीतवासाः समेघैःस्ताराहारः श्रीयुतः खं समेतः ॥ २३ ॥ पूजामादाय संध्यायां प्रगतायां यथागतम् । अन्धकाराः समुत्तस्थुर्वेताला वपुषा यथा ॥ २४ ॥ अवश्यायकणास्पन्दी हेलाविद्युतपल्लवः । कोमलः कुमुदाशंसी ववावाशीतलोऽनिलः ॥ २५ ॥ परमान्ध्यमुपाजग्मुदिशोऽविस्फुटतारकाः । लम्बदीर्घतमःकेश्यो विधवा इव योषितः ॥ २६ ॥ आययौ भुवनं तेजः क्षीरपूरेण पूरयन् । रसायनमयाकारः शशिक्षीरार्णवो नभः ॥ २७ ॥ जग्मुस्तिमिरसंघाताः पलाय्य क्वाप्यदृश्यताम् । श्रुतज्ञानगिरश्चित्तान्महीपानामिवाज्ञताः ॥ २८ ॥ ऋषयो भूमिपालाश्च मुनयो ब्राह्मणास्तथा । चेतसीव विचित्रार्थाः स्वास्पदेषु विशश्रमुः ॥ २९ ॥ यमकायोपमाश्यामा ययौ तिमिरमांसला । आययौ मिहिकास्फारा तत्र तेषामुषः शनैः ॥ ३० ॥ अन्तर्धानमुपाजग्मुस्तारा नभसि भासुराः । प्रभातपवनेनेव हृताः कुसुमवृष्टयः ॥ ३१ ॥ दृश्यतामाजगामार्कः प्रभोन्मीलितलोचनः । विवेकवृत्तिर्महतां मनसीव नवोदिता ॥ ३२ ॥ भानोर्भासा भूषितैर्मेघलेशैः किंचित्किंचित्कुङ्कुमच्छाययेव । पूर्वक्ष्माभृत्पीतवासाः समेघैस्ताराहारः श्रीयुतः खं समेतः ॥ ३३ ॥ सभां पुनरुपाजग्मुर्नभश्चरमहीचराः । ह्यस्तनेन क्रमेणैव कृतप्रातस्तनक्रमाः ॥ ३४ ॥ पूर्ववत्संनिवेशेन विवेश सकला सभा । बभूवास्पन्दिताकारा वातमुक्तेव पद्मिनी ॥ ३५ ॥ अथ प्रसङ्गमासाद्य रामो मधुरया गिरा । उवाच मुनिशार्दूलं वसिष्ठं वदतां वरम् ॥ ३६ ॥ श्रीराम उवाच । भगवन्मनसो रूपं कीदृशं वद मे स्फुटम् । यस्मात्तेनेयमखिला तन्यते लोकमञ्जरी ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ-कुछ, केसर की कान्ति के समान सुनहली सूर्य की कान्ति से सुशोभित मेघखण्डरूपी पीले वस्त्रवाला तारारूपी हार तथा श्रीसे युक्त पूर्वोक्त अस्ताचल सूर्य की कान्ति से विभूषित मेघो से युक्त एवं हार ओर श्री से युक्त अतएव समान धर्मवाले आकाश में प्रविष्ट हो गया । जैसे पीतवस्त्रधारी हार और लक्ष्मी से युक्त श्रीविष्णु भगवान आवरणरहित तथा अपने अनुरूप ध्यान करनेवाले जनों के हृदयाकाश में प्रवेश करते हैं, वैसे ही अस्ताचल ने भी आकाशमें प्रवेश किया । समासोक्ति से यह भी प्रतीत होता है कि सन्ध्या के समय भगवान्‌ का ध्यान करना श्रेष्ठ है । सन्ध्यादेवी के पूजा लेकर चले जाने पर मूर्तिमान्‌ वेतालो की भाँति भीषण अन्धकार चारों ओर छा गया । तुषारकणवाही, वृक्षों के कोमल- कोमल पत्तों को अनायास हिलाता हुआ ओर चारो ओर आस-पास विकसित कुमुदोंको सूचित करता हुआ मन्द, सुगन्ध ओर शीतल पवन बहने लगा। चारों ओर व्याप्त निबिड अन्धकाररूपी केशों से युक्त, कुहरे से आच्छन्न होने के कारण विधवा दिशाँ लम्बायमान ओर गाढ अन्धकारके समान काले केशवाली तथा सदा रोने के कारण जिनके नेत्रकी तारिका स्फुट नहीं है, ऐसी विधवा स्त्रियों के समान परम अन्धकार (निपट अन्धेपन) को प्राप्त हो गई | तदुपरान्त चाँदनीरूपी दूधके प्रवाह से सम्पूर्ण भुवन को लबालब भर रहा अमृतमयमूर्ति चन्द्रमारूपी क्षीरसागर आकाशमें आया । जैसे राजा ओके चित्तसे, जिसने ज्ञानगर्भित उपदेशवाणिर्यो सुनी थी, अज्ञता भागकर कहीं चली गई वैसे ही चन्द्रोदय से गाढ़ अन्धकार की राशियाँ भाग कर कहीं अदृश्य हो गई । जैसे श्रीवसिष्ठजी द्वारा उपदिष्ट विचित्र अर्थो ने श्रोताओं के चित्त में विश्राम लिया वैसे ही सम्पूर्ण ऋषि, मुनि, ब्राह्मण ओर राजाओं ने अपने-अपने निवासस्थानं में विश्राम किया । तदुपरान्त गाढ़ अन्धकार से परिपूर्ण अतएव यमराज (काल) के शरीर के सदश काली रात्रि चली गई और उनके निवासस्थानं में कुहरे से सरावोर प्रातःकाल ने पदार्पण किया । आकाश में दैदीप्यमान तारे प्रातःकाल के पवन से हरी गई पुष्पवृष्टियों की नाई छिप गये ओर महात्माओं के मन में नूतन उत्पन्न हुई विवेकवृत्ति की नाई अपनी कान्ति से लोगों के नयनों को खोलनेवाले श्रीसूर्यभगवान्‌ ने दर्शन दिये केसर की कान्ति के सदृश कुछ कुछ विचित्र सूर्य की सुनहली किरणों से विभूषित मेघखण्डरूपी पीतवस्त्र धारण किया हुआ उदयाचल सूर्य की अरूण कान्ति से विभूषित आकाशमें प्रविष्ट हो गया । प्रातःकाल का कृत्य समाप्त कर सभी स्वर्गवासी ओर भूलोकवासी अतीत दिन के ही क्रम से फिर सभास्थान में आये । जिस क्रम से पूर्वदिन लोग बैठे थे उसी क्रम से सारी सभा बैठी और जैसे वायु से रहित पद्यों से पूर्ण तालाब निश्चल रहता है, वैसे ही वह सभा बातकी बात में निश्चल ओर नीरव हो गई | तदुपरान्त कथा के प्रसंग का अवलम्बन कर श्रीरामचन्द्रजी ने मधुर वाणी से वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुनि श्रीवसिष्ठजी से कहा : भगवन्‌, मन का स्वरूप कैसा है, यह मुझको बतलाइए, क्योंकि मन से यह सम्पूर्ण लोकमंजरी बनी है