Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, Verses 66–74
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 4, verses 66–74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 66-74
संस्कृत श्लोक
तस्मादिमां प्रतिज्ञां त्वं श्रृणु रामातिभीषणाम् ।
यामुत्तरेण ग्रन्थेन नूनं त्वमवबुध्यसे ॥ ६६ ॥
अयमाकाशभूतादिरूपोऽहं चेति लक्षितः ।
जगच्छब्दस्य नामार्थो ननु नास्त्येव कश्चन ॥ ६७ ॥
यदिदं दृश्यते किंचिद्दृश्यजातं पुरोगतम् ।
परं ब्रह्मैव तत्सर्वमजरामरमव्ययम् ॥ ६८ ॥
पूर्णे पूर्णं प्रसरति शान्ते शान्तं व्यवस्थितम् ।
व्योमन्येवोदितं व्योम ब्रह्मणि ब्रह्म तिष्ठति ॥ ६९ ॥
न दृश्यमस्ति सद्रूपं न द्रष्टा न च दर्शनम् ।
न शून्यं न जडं नो चिच्छान्तमेवेदमाततम् ॥ ७० ॥
श्रीराम उवाच ।
वन्ध्यापुत्रेण पिष्टोऽद्रिः शशशृङ्गं प्रगायति ।
प्रसार्य भुजसंपातं शिला नृत्यति ताण्डवम् ॥ ७१ ॥
स्रवन्ति सिकतास्तैलं पठन्त्युपलपुत्रिकाः ।
गर्जन्ति चित्रजलदा इतीवेदं वचः प्रभो ॥ ७२ ॥
जरामरणदुःखादिशैलाकाशमयं जगत् ।
नास्तीति किमिदं नाम भवताऽपि ममोच्यते ॥ ७३ ॥
यथेदं न स्थितं विश्वं नोत्पन्नं न च विद्यते ।
तथा कथय मे ब्रह्मन्येनैतन्निश्चितं भवेत् ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए अन्त में विवर्तवाद ही अवशिष्ट रहता है, ऐसा कहते हैं।
इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अतिभीषण इस प्रतिज्ञा को सुनिये, जिसका स्वरूप
आप आगे के ग्रन्थ से भलीभाँति जान जार्येगे । सामने जो ये भौतिक आकाश आदि ओर
अन्दर अहं आदि लक्षित होते हैं, वे सब व्यवहारदशा में जगत् हैं; किन्तु परमार्थदशा में
ब्रह्म ही हैं । ब्रह्म के सिवा जगत्-शब्द का कोई दूसरा वास्तविक अर्थ नहीं है । जो कुछ
भी दृश्य दिखाई देता है, वह सब अजर-अमर अव्यय परम-ब्रह्म ही है । प्रत्यगात्मा जो
ब्रह्मैक्य है, वह पूर्ण में पूर्ण का प्रवेश है । चूँकि स्वप्न, जाग्रत् ओर सुषुप्ति ~ इन तीन
अवस्थाओं से रहित ब्रह्म मे आकाशादि जगत् स्थित है ओर आकाश में घट आदि उपाधियों
के त्याग से आकाश ही उदित होता है, इसलिए ब्रह्म में ही ब्रह्म रहता है, अणुमात्र भी
उसका विकार नहीं होता हे (७७) । वास्तव मेँ न यह दृश्य सद्रूप है, न द्रष्टा ओर न दर्शन
ही सद्रूप है एवं न शून्य सद्रूप है न जड़ ही सद्रूप हे ओर न बुद्धिप्रतिबिम्ब चैतन्य ही हे किन्तु
सर्वत्र व्याप्त यह ब्रह्म ही सद्रूप हे ।
उक्त विवर्तवाद में पामर पुरुषों की असंभावना दिखलाते हुए श्रीरामचन्द्रजी ने का ।
भगवन्, आपका उक्त वचन “वन्ध्या के पुत्र ने पर्वत को पीस दिया, खरगोश का सींग
गाता है, शिला भुजाओं को फैलाकर ताण्डव नृत्य करती है, बालू से तेल निकलता हे, पत्थर
की प्रतिमाएँ वेद पढ़ती हैं ओर चित्र मेँ लिखित मेघ गरजते हैं” - इन वचनो के सदृश प्रतीत
होता है। सम्पूर्णं प्रामाणिक पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी आप जरा, मृत्यु आदि विविध दुःखों
से परिपूर्ण पर्वत, आकाश आदिमय जगत् नहीं है, ऐसा अश्रद्धेय वचन विवेकशाली तथा
अवंचनीय मुझसे कैसे कहते हैं भगवन्, जैसे यह जगत् न तो अनादिकाल से स्थित है, न
उत्पन्न हुआ और न इस समय विद्यमान है, वैसे मुझसे कहिए, जिससे इसका निश्चय हो
जाय