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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जगदाकाशमेवेदं यथा हि व्योम्नि मौक्तिकम् । विमले भाति स्वात्मैव जगच्चिद्गगनं यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, यह जगत्‌ चिदाकाशरूप ही है। शंका : यदि यह चिदाकाशरूप ही है, तो इसकी पृथक्‌ प्रतीति कैसे होती है ? समाधान : जैसे निर्मल आकाश में भ्रमवश मोतियों का समूह प्रतीत होता है वैसे ही भ्रमवश इसकी भी पृथक्‌ प्रतीति होती है चिदाकाशरूप आत्मा ही जैसे जगत्‌ हुआ है, वैसे दृष्टान्त मेँ आपसे कहता हूँ, सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग बार-बार दृष्टान्त और विविध युक्तियों द्वारा चित्‌ और चेत्य के अभेद का ज्ञान कराने के लिए मण्डपाख्यान का आरम्भ ।