Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
जालान्तर्गतसूर्याभा जालाकाररजांस्यपि ।
जगद्भानं प्रति स्थूलान्यणुं प्रति यथाचलाः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मूढ पुरुषों की दृष्टि मे जगत् विशाल प्रतीत होता है, पर वास्तव में, विद्वानों की
दृष्टि में, ऊँचे झरोखों और चिमनियों की राह से घर में पैठे हुए दण्डाकार सूर्य-किरणों में नाच
रहे अणुओं से भी जगत् छोटा है, ऐसा कहते हैं।
जैसे अणुओं की अपेक्षा पहाड़ स्थूल (विशाल) हैं, वैसे ही जगत्प्रतीति की अपेक्षा झरोखे
से अन्दर पैठी हुई धूप का झरोखे के छेद के अनुसार बना हुआ दण्ड और मूसल के समान जो
आकार है, उसमें दिखाई देनेवाले अत्यन्त छोटे-छोटे कण भी स्थू ल हैं । जब इतने सूक्ष्म
रजकण जगत् के भान की अपेक्षा स्थूल हैं, तब उसकी अपेक्षा औरों के स्थूलतम होने में तो
सन्देह ही क्या है ? (२)