Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अत्रेदं मण्डपाख्यानं शृणु श्रवणभूषणम् ।
निःसंदेहो यथैषोऽर्थश्चित्ते विश्रान्तिमेष्यति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व मे जो उपदेश दिया गया है, उसके विषय मे रामचन्द्रजी को सन्देह, अज्ञान ओर
अनिश्चय है, यह रामचन्द्रजी की चेष्टाओ से जानकर उन्हें दूर करने के लिए श्रीवस्रिष्ठजी
उक्त अर्थ की उपपत्ति करनेवाली सैको कथाओं से युक्त मण्डपाख्यान को सुनाने के लिए
प्रतिज्ञा करते हैं ।
है रामजी, इस विषय में आप कानों का विभूषण रूप मण्डपाख्यान को सुनिये, जिससे
मेरे द्वारा उपदिष्ट यह विषय आपके चित्तमें बिना किसी सन्देह के बैठ जायेगा