Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अनुत्कीर्णै भातीव त्रिजगच्छालभञ्जिका ।
चित्स्तम्भेनैव सोत्कीर्णा नचोत्कर्तात्र विद्यते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिजगत्रूपी प्रतिमा गढ़े बिना ही प्रतीत-सी होती
है, क्योकि जैसे पत्थर के खम्भे में प्रतिमा गढ़े बिना ही प्रतीत-सी होती है, क्योंकि जैसे
पत्थरके खम्भे में प्रतिमा गढी जाती है वैसे चित्रूपी खम्भे में न तो वह (त्रिजगत्रूपी प्रतिमा)
गढ़ी गई है और न उसका कोई गढ़ने वाला शिल्पी ही है । भाव यह कि प्रथम तो चित् से
अतिरिक्त कोई चेतन प्रसिद्ध ही नहीं है, जो चित्रूपी खम्भे में उसे गढ़े और दूसरी बात यह
भी है कि निर्विकार और असंग चित्रूपी खम्भे का पत्थर के खम्भे के समान उत्कर्तन (तराशना)
नहीं हो सकता