Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verses 20–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verses 20–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 20-31
संस्कृत श्लोक
मर्यादापालनाम्भोधिर्द्विषत्तिमिरभास्करः ।
कान्ताकुमुदिनीचन्द्रो दोषतृणहुताशनः ॥ २० ॥
मेरुर्विबुधवृन्दानां यशश्चन्द्रो भवार्णवे ।
सरः सद्गुणहंसानां कमलामलभास्करः ॥ २१ ॥
संग्रामवीरुत्पवनो मनोमातङ्गकेसरी ।
समस्तविद्यादयितः सर्वाश्चर्यगुणाकरः ॥ २२ ॥
सुरारिसागरक्षोभविलसन्मन्दराचलः ।
विलासपुष्पौघमधुः सौभाग्यकुसुमायुधः ॥ २३ ॥
लीलालतालास्यमरुत्साहसोत्साहकेशवः ।
सौजन्यकैरवशशी दुर्लीलावल्लिकानलः ॥ २४ ॥
तस्यास्ति सुभगा भार्या लीला नाम विलासिनी ।
सर्वसौभाग्यवलिता कमलेवोदिताऽवनौ ॥ २५ ॥
सर्वानुवृत्तिललिता लीला मधुरभाषिणी ।
सानन्दमन्दचलिता द्वितीयेन्दूदयस्मिता ॥ २६ ॥
अलकालिमनोहारिवदनाम्भोजशालिनी ।
सिताङ्गी कर्णिकागौरी जङ्गमेव सरोजिनी ॥ २७ ॥
लताविलासकुन्दौघभासिनी रसशालिनी ।
प्रवालहस्ता पुष्पाभा मधुश्रीरिव देहिनी ॥ २८ ॥
अवदाततनुः पुण्या स्पर्शनाह्लादकारिणी गङ्गेव गां गता देहवती हंसविलासिनी ॥ २९ ॥
तस्य भूतलपुष्पेषोः सकलाह्लाददायिनः ।
परिचर्यां चिरं कर्तुमन्या रतिरिवोदिता ॥ ३० ॥
उद्विग्ने प्रोद्विग्ना मुदिते मुदिता समाकुलाकुलिते ।
प्रतिबिम्बसमा कान्ता संक्रुद्धे केवलं भीता ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र अपनी वेलारूपी
मर्यादा का पालन करते हैं, कभी उसका उल्लंघन नहीं करता, वैसे ही वह अपनी वर्णश्रम
मर्यादा का पालन करता था, जैसे सूर्य अन्धकार का विनाशक है, वैसे ही वह अपने शत्रुओं
का विनाशक था, जैसे चन्द्रमा कुमुदिनी को (कुई को) प्रफुल्लित करता है, वैसे ही वह
अपनी सहधर्मिणीरूपी कुमुदिनी को प्रफुल्लित (प्रसन्न) रखता था, जैसे अग्नि तिनकों को
भस्म कर देती हे वैसे ही वह दोषों का शत्रु था, जैसे सुमेरु पर्वत देवताओं का आश्रय
(निवासस्थान) है वैसे ही वह विद्रद्वृन्द का आश्रय था, संसाररूपी सागर में उसके यशरूपी
चन्द्रमा की चाँदनी सदा छिडकी रहती थी, जैसे मानसरोवर हंसों का आवासस्थान है वैसे
ही वह व्यास दाक्षिण्य आदि सद्गुणो का आवास था, जैसे निर्मल (मेघमुक्त) सूर्य कमलों
को विकसित कर देता है, वैसे ही वह कमल को (राजलक्ष्मी को) विकसित करता था यानी
उत्कर्ष को पहुँचता था । जैसे वायु लताओं को कपा देता है, वैसे ही वह संग्रामभूमि में लता
तुल्य अपने शत्रुओं का हृदय दहला देता था, अतएव वह रणगर्वित शत्रुके मनरूपी हाथी
के मर्दन में सिंहसद्श था (अथवा जैसे सिंह हाथी को अपने चंगुल में कर लेता है, वैसे ही
वह अपने मन को अपने वश में रखनेवाला था), वह सम्पूर्ण विद्याओं का प्यारा था ओर
सम्पूर्ण चमत्कारमय गुणों का आगार (खान) था । जैसे समुद्रमंथन के समय घूम रहे (नाच
रहे) मन्दराचल ने समुद्र को विश्चुब्ध (विलोडित) कर दिया था, वैसे ही उसने दैत्यों की
सेना को अनेक वार विक्षुब्ध कर दिया था (मथ डाला था), जैसे वसन्तु ऋतु विविध प्रकार
के फूलों की जननी है, वैसे ही वह विविध विलासो का जनक था ओर सुन्दरता में दूसरा
कामदेव था, जैसे वायु लता के मन्द-मन्द नर्तन का हेतु है वैसे ही वह विविध लीलाओं
के विलास का हेतु था, जैसे भगवान् श्रीहरि ने अन्य लोगों से असाध्य पृथिवी का उद्धार
आदि कठिन कार्य किये थे, वैसे ही अन्य लोगोंसे असाध्य कठिन से कठिन कार्य करने में
वह कटिबद्ध रहता था, जैसे चन्द्रमा कुमुदिनी को विकसित करता है, वैसे ही वह सज्जनता
को विकसित करता था ओर जैसे अग्नि तुच्छ लताओं को जला डालती है, वैसे ही वह
दुष्टतारूपी विषलताओं का दाहक था । राजा पद्म की स्त्री का नाम लीला था । वह
वनितोचित सम्पूर्ण विलासो में दक्ष ओर बड़ी सुन्दरी थी | वनिताओं के सम्पूर्ण सौभाग्य
उसे प्राप्त थे, अतएव वह पृथिवी में अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी थी । लीला पतिसेवा के जितने
प्रकार हो सकते हैं, उन सबमें निपुण थी और बडी मधुरभाषिणी थी । उसका आनन्दपूर्वक
मन्द-मन्द गमन था ओर रूप दूसरे चन्द्रमा के उदय के सदृश उज्ज्वल था । उसका
कमल-सा मुँह भ्रमर जैसे अलकों से अतिमनोहर लगता था, उसका शरीर बड़ा गौर था
ओर उसमें कान के आभूषणों की दीप्ति से पीली छटा छटकती थी अतएव वह कर्णिका से
(कमल के बीच के हिस्से से ) पीली तथा चलने-फिरने वाली सफेद कमलिनी सी प्रतीत
होती थी । जैसे मूर्तिमती वसन्त शोभा रसशालिनी (फूलों के रस शहद से शोभित होने
वाली) होती है, वैसे ही वह भी रसशालिनी (अपने पति पर अत्यधिक प्रेम से शोभित
होनेवाली) थी, जैसे वसन्तशोभा प्रवालहस्ता और पुष्पाभा (प्रवाल-पल्लव ही जिसके
हाथ हैं और पुष्प ही जिसकी कान्ति है ।) होती है, वैसे ही वह भी प्रवालहस्ता और पुष्पाभा
(पल्लव के सदुश रक्त हाथवाली और फूलों की कान्ति की नाई कान्तिवाली) थी । जैसे
गंगाजी का जल अतिनिर्मल होता है, वैसे ही उसकी देह निर्मल थी, जैसे ब्रह्मद्रवस्वरूप
गंगाजी के जल के स्पर्श से आनन्द (जन्ममरणजनित क्लेश से मुक्ति) होता है, वैसे ही
उसके स्पर्श से आनन्द होता था, गंगाजल के समान वह पवित्र थी और जैसे गंगाजी हंस
विलासिनी (जिसमें हंस क्रीडा करते हैं) हैं, वैसे ही वह भी हंसविलासिनी (हंसगति) थी,
अतएव वह भूमि में अवतीर्णं मूर्तिमती गंगाजी ही थी । सबको आनन्द देनेवाला राजा पद्य
भूतल का कामदेव (& ) था, उसकी चिरकाल तक सेवा शुश्रुषा करने के लिए मानों वह
दूसरी रति उत्पन्न हुई थी । पतिपरायणा लीला राजा के दुःख में दुःखी होती थी, सुख में
सुखी होती थी, राजा की चिंता से चिन्तायुक्त होती थी, सचमुच वह राजा के प्रतिबिम्ब
के सदृश थी, परन्तु जब राजा कभी क्रुद्ध होते थे, तो वह केवल भयभीत ही होती थी, क्रुद्ध
नहीं होती थी, एकमात्र इसी अंश में उसमें प्रतिबिम्बतुल्यता न थी