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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

आकाशरूपमेवाच्छं पिण्डग्रहविवर्जितम् । व्योम्नि व्योममयं चित्रं संकल्पपुरवत्स्थितम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि किसी को शंका हो कि विशालतम जगत्‌ आकाश के समान शून्यप्राय चित्त की वासनाओं में कैसे अन्तर्भूत हो सकता है, तो इस पर कहते है । आकार के स्वीकार से रहित (अमूर्त) यह जगत्‌ स्वच्छ आकाश रूप ही है, यह आकाश मेँ मनोरथ से कल्पित (काल्पनिक) विचित्र नगर की नाई आकाश में स्थित है