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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

अनुभूतान्यपीमानि जगन्ति व्योमरूपिणि । पृथ्व्यादीनि न सन्त्येव स्वप्नसंकल्पयोरिव ॥ ६ ॥ पिण्डग्रहो जगत्यस्मिन्विज्ञानाकाशरूपिणि । मरुनद्यां जलमिव न संभवति कुत्रचित् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म के भेद से जगत्‌ का भान नहीं होता है, इस कथन में प्रत्यक्षानुभव से विरोध का परिहार करते है। जैसे स्वप्न ओर संकल्प (मनोरथ ) में अनुभूत घट, पट आदि पदार्थ जाग्रत के पदार्थ जैसे पार्थिव (भौतिक) नहीं होते, वैसे ही चिदाकाशरूपी परब्रह्म में प्रतीत होते हुए भी ये जगत्‌ पृथिवी आदिरूप (भौतिक) है ही नहीं । जैसे मरुभूमि में नदी के समान प्रतीत हो रहीं सूर्य की किरणों में (मृगतृष्णा मेँ ) कदापि जलका संभव नहीं है वैसे ही विज्ञानाकाशरूपी (चिदाकाशरूपी) इस जगत्‌ में मूर्तता का (साकारता का) स्वीकार कदापि नहीं हो सकता