Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 120
23 verse-groups
- Verses 1–2एक सौ उन्नीसर्वोँ सर्गे समाप्त एक सौ बीसवाँ सर्गं राजा लवण का विन्ध्यस्थित पूर्वदृष्टि शब…
- Verse 3जिस महावन में मैंने दुःख देखा, चित्त रूपी दर्पण में स्थित उस महावन का मैं स्मरण करता हूँ।…
- Verses 4–5यों विचार कर राजा मन्त्रियों के साथ दक्षिण दिशा को गये । पुन:दिगविजय के लिए मानों विन्ध्य…
- Verse 6इसके अनन्तर एक प्रदेश में आगे आई हुई चिन्ता के समान उस उत्कट महावन को परलोकभूमि के समान र…
- Verse 7वहाँ पर विचर रहे राजा ने पहले अनुभूत वे सब वृत्तान्त देखे, पूछे और पहचाने एवं राजा के आश्…
- Verse 8कौतूहल से भरे हुए राजा लवण ने उन व्याधों को और चण्डालों को पहचाना तथा आश्चर्यमग्न होकर फि…
- Verse 9तदनन्तर महावन में पहुँचकर उस वन के धुएँ से भरे हुए एक छोर पर उसी गाँव में पहुँचा, जिसमें…
- Verse 10वहाँ पर उसने पहले से परिचित उन उन पुरुषों के, पूर्वदृष्ट उन स्त्रियो को पहले अनुभूत उन छो…
- Verses 11–13दुर्भिक्ष में (अकाल में) दुर्दशायुक्त हुए उन उन पूर्वानुभूत वृक्षों को, उन अपने अनुगामियो…
- Verse 14हे पुत्रि, तुम्हारा सारा वदन पुत्रों से ढका होगा, तीन दिन तक भोजन न मिलने के कारण तुम्हार…
- Verse 15इस समय राजा लवण के करम्ब के पोषण के लिए किये गये साहस कर्मका स्मरण करती हुई कहती है । हे…
- Verse 16कदम्ब ओर जम्बीर के पेड़ों तथा लौंग ओर गुंजा की लताओं के निकुजों के (झाड़ियों के) भीतर छिर…
- Verse 17इस समय अपनी लड़की के ऊपर मोहित हुए उसकी मुखशोभा का स्मरण कर वर्णन करती है। आसवपान आदि के…
- Verse 18इस समय पति के साथ अपनी लड़की के मरण की संभावना करती हुईं कहती है । जैसे वन में तमाल की लत…
- Verse 19गुंजा के फलों की मालारूपी हार धारण करनेवाली, उन्नत और विशाल स्तन मण्डल से युक्त अंगवाली,…
- Verse 20हे चन्द्रमा के समान सुन्दर राजकुमार, तुम्हारे लिए मुझे बड़ा शोक है, तुमने एक से एक बढ़कर…
- Verse 21संसाररूपी नदी के सुन्दर तरंगरूप कर्मपरिपाकोंने, जिनके लिए उपहास उचित है, क्या गर्हित फल प…
- Verse 22जैसे दुर्भाग्य के दिन आने पर बहुत मनोरथों से युक्त आशा धन के साथ नष्ट हो जाती है, वैसे ही…
- Verses 23–24अब अपने भाग्य को कोसती है । हे सखियों, बडे क्लेश की बात है कि मेरे पतिदेव मर चुके हैं, अभ…
- Verse 25इस समय अपने सदश अन्य जनकी भी निन्दा करती हुई कहती है। भाग्य से सताये गये, बन्धु-बान्धव ही…
- Verse 26जैसे वर्षा ऋतु में जनों से रहित तथा पृथिवी के एक देश में स्थित पर्वत के सैंकड़ों शाखाओं औ…
- Verse 27इस प्रकार विलाप कर रही तथा चण्डालता को प्राप्त हुए अपने पोषणीय लोगों में सबसे बड़ी-बूढ़ी…
- Verses 28–30तदुपरान्त आँसुओं से भरे हुए नेत्रवाली उसने कहा : पुष्पसघोष नामका यह गाँव हे, यहाँ पर पुष्…