Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verses 11–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

तांश्चाकाण्डपरिभ्रष्टांतान्वृक्षांस्तांस्त्वनुव्रजान् । तांस्तथैव समुद्देशास्ताऋयाधानेकलान्सुतान् ॥ ११ ॥ अन्यासु वृद्धासु सबाष्पनेत्रास्वार्तार्तियुक्तासु च वर्णयन्ती । अकालकान्तारविशीर्णबन्धुर्दुःखान्यसंख्यानि सखीषु वृद्धा ॥ १२ ॥ वृद्धा प्रवृद्धोज्ज्वलनेत्रबाष्पा कष्टं बताशुष्ककुचा कृशाङ्गी । अवग्रहोग्राशनिदग्धदेशे तत्रार्तनादा परिरोदितीदम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

दुर्भिक्ष में (अकाल में) दुर्दशायुक्त हुए उन उन पूर्वानुभूत वृक्षों को, उन अपने अनुगामियों को, उन उन प्रदेशों को, उन व्याधों को और बन्धुशून्य अपने पुत्रों को देखा । आँसू बहा रही, क्लेश सहती हुई अन्यान्य बूढ़ी सहेलियों के बीच में दुर्भिक्ष के समय विकट वन में नष्ट-भ्रष्ट हुए अपने बन्धु-बान्धवों के असंख्य दुःखों का वर्णन कर रही एक बुढ़िया, अन्य वृद्धो की अपेक्षा जिसके नेत्रो से अधिक आँसुओं की धाराँ बह रही थी, फटी पुरानी कथरी जिसने ओढ रक्खी थी, जिसके स्तन सूख गये थे, शरीर सूखकर तिनका हो गया था, उस दुर्भिक्षरूपी प्रचण्ड वज से लाये गये देशमें बड़े करुण क्रन्दन के साथ यों रो रही थी