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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verses 28–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

उवाच सा बाष्पविलोचनाथ ग्रामस्त्वयं पुष्पसघोषनामा । इहाभवत्पुष्कसकः पतिर्मे बभूव तस्येन्दुसमा सुतैका ॥ २८ ॥ सा दैवयोगात्पतिमिन्द्रतुल्यमिहागतं दैववशेन भूपम् । अयं विशीर्णं मधुकुम्भमाप वने वराकी करभी यथैका ॥ २९ ॥ सा तेन सार्धं सुचिरं सुखानि भुक्त्वा प्रसूता तनयाः सुतांश्च । वृद्धिं गता काननकोटरेऽस्मिंस्तुम्बीलता पादपसंश्रितेव ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त आँसुओं से भरे हुए नेत्रवाली उसने कहा : पुष्पसघोष नामका यह गाँव हे, यहाँ पर पुष्पक नाम का मेरा पति हुआ | उसकी चन्द्रमा के तुल्य एक लड़की हुई । जैसे बेचारी करभी (गदही या ऊँट) वन में फूटे हुये शहद के घड़े को प्राप्त हो, वैसे ही उसने भाग्यवश यहाँ पर आये हुए इन्द्र के तुल्य राजा को दुभग्यसे पति पाया । उसके साथ चिरकालतक सुख का उपभोग कर उसने लड़कियाँ ओर लड़के पैदा किये, इस वन की गुफा में वह पेड के सहारे स्थित हुई लौकी की लता के सदुश वृद्धि को प्राप्त हुई