Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
हेमोर्मिकादिवन्मिथ्या कथितायाः क्षयोन्मुखम् ।
त्वं महत्त्वमविद्यायाः शृणु राघव कीदृशम् ॥ १ ॥
लवणोऽसौ महीपालस्तथा दृष्ट्वा तदा भ्रमम् ।
द्वितीये दिवसे गन्तुं प्रवृत्तस्तां महाटवीम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
एक सौ उन्नीसर्वोँ सर्गे समाप्त
एक सौ बीसवाँ सर्गं
राजा लवण का विन्ध्यस्थित पूर्वदृष्टि शबरों के गौव में फिर जाकर चण्डाली सास के साथ संवाद |
सुवर्ण की अँगूठी के दृष्टि से वर्णित जगत् की ब्रह्मविवर्तता उसकी परीक्षा कर चुके लवण
के अनुभव से सिद्ध है । आपको भी विचार करके जगत् की ब्रह्मविवर्तता का प्रत्यक्ष करना
चाहिए, उस आशय से कहते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, सुवर्ण में कल्पित अँगूठी के तुल्य मिथ्या कही
गई अविद्या की विचारमात्र से क्षयोन्मुख आश्चर्यभूतता कैसी है, इसे आप सुनिये । राजा
लवण, जिसका पहले वर्णन कर चुके हैं, वैसे भ्रम को उस समय देख कर दूसरे दिन उस
महाअरण्य में जाने के लिए तत्पर हुए