Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 12
ग्यारहर्वौँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग आगे अपवाद से सम्पूर्ण सृष्टिका अत्यन्त अभाव कहने के लिए अपवादानुरूप अध्यारोपभूत सृष्टिका विस्तार से वर्णन ।
27 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने पहले जिस विषय की प्रतिज्ञा की थी, उसको कहने के लिए भूमिका बोधिते हुए बोले…
- Verse 2जैसे सुषुप्त आत्मा ही स्वप्न-सदुश प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्म ही सृष्टि की नाई प्रतीत…
- Verse 3चूँकि यह सम्पूर्ण विश्व स्वभावतः सदा अनन्तप्रकाशरूप तथा अनन्तचैतन्यस्वरूप ब्रह्म का सत्ता…
- Verses 4–5पहले उसमें “स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति (उसने संकल्प किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ) इस श्…
- Verses 6–7ईक्षणवृत्ति और ईक्षणवृत्ति के विषयरूप उपाधियों से उसमें ईश्वरभाव और जीवभाव को दशति हैं। ४…
- Verse 8वैसे होने पर भी ब्रह्मसत्ता स्वरूप से विनष्ट नहीं होती, ऐसा कहते हैं। उस समय ब्रह्मसत्ता…
- Verse 9शंका - सो कैसे 7 समाधान - ब्रह्मस्वभाव ही ऐसा है । भाव यह है कि उक्त ब्रह्मसत्ता का स्वभा…
- Verse 10पूर्वोक्त हिरण्यगर्भरूप जीव के अहन्ताभिमान की और तवसे लेकर द्विपरार्द्धपरिमित ब्रह्मा की…
- Verse 11उक्त आकाश, अहंकार और काल की सृष्टि हिरण्यगर्भ से नहीं होती, किन्तु हिरण्यगर्भरूप उपाधि से…
- Verse 12“मैं आकाश होऊँ ' इस अहंकार से (अभिमान से) जिसका स्वरूप प्रायः आकाश-सा हो जाता है ऐसी संवि…
- Verse 13आकाशाहंकायोपाधि से उपहित परमात्मसत्ता ही जब सम्पूर्ण शब्दोके बीज-भूत शब्द तन्मात्र रूप बन…
- Verse 14वेद आदि सम्पूर्ण शब्दों का शब्दतन्मात्रा उपादान है, ऐसा कहते हैं। भावी (होनेवाले) नामों क…
- Verse 15इस प्रकार वेदरूपता को प्राप्त हुए परमात्मा से, जो कि शब्दसमूह से निर्मित पदार्थसमूहरूप पर…
- Verse 16इस प्रकार वायुपर्यन्त जिसका परिवार है, ऐसी वह चिति जीवशब्द से कही जाती है । वही भावी नाम-…
- Verse 17वह (परमात्मा) व्यष्टिप्राणरूप से आध्यात्मिक सम्पूर्ण क्रियाओंका हेतु है, ऐसा कहते हैं । च…
- Verses 18–19वही चैतन्य जव मैं वायु हूँ" इस अभिमान से युक्त होता है तब वह सम्पूर्ण स्पर्शो का उपादानका…
- Verses 20–21वायु की उत्पत्ति के पश्चात् तेज की उत्पत्ति कहते हैं। तदुपरान्त “मेँ प्रकाशरूप होऊँ” इस…
- Verses 22–23तदुपरान्त जल की उत्पत्ति कहते हैं। वह तेजस्वरूपता को प्राप्त चैतन्य मानों जलके विविध रस म…
- Verse 24तदनन्तर पृथिवी की सृष्टि कहते हैं । जलभाव को प्राप्त परमात्मा “मैँ पृथिवी ही हूँ” यों संक…
- Verse 25अब पृथिवी की सृष्टि का उपयोग बतलाते हैं। भावी (आगे होनेवाले) ब्रह्माण्डगोलकरूप से या ज्यो…
- Verse 26उक्त रीति से उत्पन्न पाँच थूतों के संमिश्रण से ब्रह्माण्डाकार का विकास कहते है । चैतन्य क…
- Verse 27कितने समय तक वे संमिश्रणभाव में स्थित रहते हैं, ऐसी आकांक्षा होने पर कहते है । ये पाँच भू…
- Verse 28जितनी वस्तुओं का स्थूलरूप से आविभावि हुआ, वे सब पहले ब्रह्मसत्ता से विद्यमान थी, इस बात क…
- Verse 29यदि किसीको आशंका हो कि भ्रूततन्मात्रा अतिसूक्ष्म हैं, अतएव स्थानाभाव उनमें स्थूल पदार्थों…
- Verse 30तन्मात्राओं के उक्त रीति से स्थूल हो जानेपर भी उनके यूक्ष्म-रूप की क्षति नहीं होती, क्योक…
- Verse 31इस सर्ग में पहले जो विषय कहा गया है, उसका स्मरण कराते हुए इस सर्ग का उपसंहार करते हैं। यह…
- Verse 32जो पहले यह कहा था कि ब्रह्म ही जगत् के आकार में परिणत होता है, वह पूर्वोक्त रीति से सिद्…