Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
प्रसवं परिपश्यन्ति शतशाखं स्फुरन्ति च ।
परमाण्वन्तरे भान्ति क्षणात्कल्पीभवन्ति च ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसीको आशंका हो कि भ्रूततन्मात्रा अतिसूक्ष्म हैं, अतएव स्थानाभाव उनमें स्थूल
पदार्थों का रहना विरूद्ध प्रतीत होता है, इस पर कहते हैं ।
तन्मात्राओं की स्थूल पदार्थों की वास्तव में स्थिति नहीं है, किन्तु उनसे उनकी केवल
मायिक उत्पत्ति दिखलाई देती है और फिर वे शाखा-प्रशाखा के भेद से विविध विस्तार को
प्राप्त होते हैं और क्षण में ही विलीन हो जाते हैं । पूर्वोक्त मायिक उत्पत्ति का प्रदर्शन अतिसूक्ष्म
वस्तु में भी होता है, यह भाव है