Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
समनन्तरमेवास्याः स्वसत्तोदेति शून्यता ।
शब्दादिगुणबीजं सा भविष्यदभिधार्थदा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका - सो कैसे 7
समाधान - ब्रह्मस्वभाव ही ऐसा है । भाव यह है कि उक्त ब्रह्मसत्ता का स्वभाव ही है कि
वह केवल भावनामात्र से (संकल्पमात्र से) संसारभाव को प्राप्त होती है, उसमें किरी प्रकारका
विकार होकर वह संसारभाव को प्राप्त होती है, यह बात नहीं हे ।
शंका - तो उसका जीवभाव कैसे होता है ?
समाधान - रज्जु में सर्प की नाई उसीमें जीवभाव का उदय होता है ।
अब श्रीमहामुनि वसिष्ठजी महाभूतों की सृष्टि को कहने की इच्छा से पहले आकाश की
सृष्टि कहते हैं।
जीवभाव का उदय होने के अनन्तर अन्य भूतों को अवकाश देनेवाली होने के कारण
शून्यप्रायः (प्रायः रिक्त) आकाशसत्ता उदित होती है, जो कि सूर्य आदि की सृष्टिके
पश्चात् होनेवाले आकाश आदि नामों के अर्थ को (आकाश यानी आसमन्तात्-काशते
प्रकाशते यानी चारों ओर जो प्रकाशित है, इत्यादि अर्थको) देती है और शब्द आदि गुणों
की कारण है