Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
संवित्तिमात्ररूपाणि स्थितानि गगनोदरे ।
भवन्ति वटजालानि यथा बीजकणान्तरे ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जितनी वस्तुओं का स्थूलरूप से आविभावि हुआ, वे सब पहले ब्रह्मसत्ता से विद्यमान थी,
इस बात को दृष्टान्तपूर्वक कहते हैं ।
जैसे वट के अतिसूक्ष्म बीज के अन्दर विशाल वटवृक्ष स्थित है, वैसे ही ये ब्रह्माण्ड भी
अव्याकृत आकाश के अन्दर केवल संविद्रूप से स्थित है