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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

सुषुप्तं स्वप्नवद्भाति भाति ब्रह्मैव सर्गवत् । सर्वात्मकं च तत्स्थानं तत्र तावत्क्रमं श्रृणु ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सुषुप्त आत्मा ही स्वप्न-सदुश प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्म ही सृष्टि की नाई प्रतीत होता है । (यह कल्पना दष्ट के अनुसार है ।) स्वप्न केवल एक पुरूषकी वासना का कार्य है, अतः स्वप्नप्रतीति दृढ़ नहीं होती और प्रपंच सम्पूर्ण जीवों की वासना से उत्पन्न है, अतः उसकी प्रतीति युद्ढ है, इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी पूर्वोक्त शंका के परिहार के अभिप्राय से कहते हैं। उसका अधिष्ठान सर्वात्मक (सर्वसुषुप्तसमष्ट्यवस्थ और सर्वप्रलयावस्थ) ब्रह्म है। इस विषय में आप क्रम को सुनिये