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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

भावयंस्तनुतामेव रसस्कन्ध इवाम्भसः । स्वदनं तस्य सङ्घस्य रसतन्मात्रमुच्यते ॥ २२ ॥ भाविवारिविलासात्मा तद्बीजं रसशाखिनः । अन्योन्यस्वदने तस्मात्संसारः प्रसरिष्यति ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त जल की उत्पत्ति कहते हैं। वह तेजस्वरूपता को प्राप्त चैतन्य मानों जलके विविध रस मैं ही हूँ, इस प्रकार अपनी जलरूपता की (अथवा परिच्छिन्नता की) भावना करता हुआ जलरूपता को प्राप्त होता है। जलरूप मूर्त द्रव्य (पदार्थ) का जिह्ला से आस्वाद लेने पर “यह मीठा है” इस प्रकार का जो स्वाद है, वह सम्पूर्ण रसों का एकमात्र उपादान होने से रसतन्मात्रा कहलाता है । वह रसरूपी वृक्षका बीज है और भावी जलके विविध आकारों को धारण करनेवाला हे । इन्द्रिय और विषयरूप से परस्पर रस का आस्वाद लेने पर विषयों में अनुराग आदि की उत्पत्ति से पुनः पुनः विषयों के उपार्जन में प्रवृत्तिरूप संसार का उससे प्रसार होता है