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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

तन्मात्रगणमेतत्स्यात्सा संकल्पात्मिका चितिः । वेदनात्रसरेण्वाभमनाकारैव पश्यति ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस सर्ग में पहले जो विषय कहा गया है, उसका स्मरण कराते हुए इस सर्ग का उपसंहार करते हैं। यह तन्मात्रासमूह, जिसका पहले विस्तार से वर्णन किया गया है, संकल्पस्वरूप चैतन्य ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है; कारण कि चैतन्य ही भे अमुक हूँ” इस अभिमान से तत्‌-तत्‌ स्वरूप हुआ है । चैतन्य अपने स्वरूप से तो निराकार ही है, पर संकल्परूप से वह अपने को त्रसरेणुसदृश (स्थूलरूप) देखता है