Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तस्याः शक्तेः परायास्तु स्वसंवेदनमात्रकम् ।
एतज्जालमसद्रूपं सदिवोदेति विस्फुरत् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त आकाश, अहंकार और काल की सृष्टि हिरण्यगर्भ से नहीं होती, किन्तु हिरण्यगर्भरूप
उपाधि से उपहित परमात्मसत्ता से ही होती है, क्योकि वही सबकी हेतु है, ऐसा कहते हैं ।
उस परमशक्ति (परमात्मसत्ताका) स्वसंकल्पमात्ररूप यह प्रकाशमान असदात्मक दृश्य
प्रपच सत् की नाई उससे उदित होता है । इसके उदयसे परमात्मसत्तामें किरी प्रकारका
विकार नहीं होता, यह सूचन करने के लिए “स्वसंवेदनमात्रकम्” कहा हे