Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verses 6–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
ततः सा परमा सत्ता सचेतश्चेतनोन्मुखी ।
चिन्नामयोग्या भवति किंचिल्लभ्यतया तथा ॥ ६ ॥
घनसंवेदना पश्चाद्भाविजीवादिनामिका ।
संभवत्यात्तकलना यदोज्झति परं पदम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
ईक्षणवृत्ति और ईक्षणवृत्ति के विषयरूप उपाधियों से उसमें ईश्वरभाव और जीवभाव को
दशति हैं।
४ चैतन्यरूप ब्रह्म की सत्ता ही उसका परमार्थरूप है, उसकी सत्ता से अतिरिक्त उसका रूप नहीं है।
तदुपरान्त वह परम सत्ता ही ईक्षणात्मक वृत्ति से युक्त चेतना में (उक्त ईक्षणात्मक वृत्ति में
अभिव्यक्त चैतन्य में) उन्मुख होकर यानी ईक्षणवृत्तिसहित चेतनाप्रधान होकर वाणी के व्यवहार
के विषय धर्मो से युक्त होने के कारण वाणी से प्राप्य (ज्ञेय) होने से यानी वाणी के व्यवहार के योग्य
होने से “चित् नाम के योग्य (“सर्वज्ञ ईश्वर” नाम के योग्य) होती है। पीछे चिरकाल की अनुवृत्ति
से जिसकी ईक्षणवृत्ति अत्यन्त धन हो गई है और जिसने उक्त ईक्षणवृत्ति के विषय सूक्ष्म
प्रपंचस्वरूपतारूप परिच्छेद स्वीकार कर लिया है एवंभूत वही परमसत्ता जब परम पदका त्याग
करती है तब भावी प्राणधारणरूप उपाधिवाले जीव, हिरण्यगर्भ आदि नामवाली होती हे