Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 118

एक सौ सत्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अट्टारहवाँ सर्ग मोक्षपर्यन्त सात प्रकार की ज्ञानभूमिका का अपने-अपने लक्षणों के साथ भलीभाँति वर्णन ।

21 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, सात प्रकार की इस ज्ञानभूमिका को आप सुनि…
  2. Verse 2यदि कोई शंका करे कि योगशास्त्र मे यम, नियम आदि आठ अगो के भेदो से थिन्‍न जो योगशभूमिकाएँ प…
  3. Verse 3ज्ञेय क्या है अथवा ज्ञान क्या है ? जिसकी भूमिकाओं का आप वर्णन करते हैं, ऐसी जिज्ञासा होने…
  4. Verse 4पूर्वापर अवस्थाओं से कल्पित अवान्तर प्रवृत्ति निपित्तभूत भेद के, जो कि मिथ्याभूत है, नष्ट…
  5. Verses 5–7पहली ज्ञानभूमिका शुभेच्छा कही गई है, दूसरी का नाम विचारणा है, तीसरी तनुमानसा कही जाती है,…
  6. Verse 8मैं मूढ होकर ही क्यों स्थित हूँ, विचारित वेदान्तवाक्यों से ओर गुरूजनों से परमतत्त्व को दे…
  7. Verse 9शास्त्राभ्यास, गुरूुओं के साथ संसर्ग, वैराग्य और अभ्यासपूर्वक जो प्रवृत्ति (५६) है, वह वि…
  8. Verse 10विचारणा और शुभेच्छा से साधन चतुष्टय सम्पत्तिपूर्वक किये गये श्रवण और मननसे युक्त निदिध्या…
  9. Verse 11योगशास्त्र में भी कहा गया है : श्रोत्रादिकरणैयाविच्छब्दादिविषयग्रह: । तावद्धयानमितिप्रोक्…
  10. Verse 12शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति इन चार ज्ञानभूमिकाओं के अभ्यास से बाह्य और आभ्य…
  11. Verse 13इसी भूमिका के अत्यन्त परिपाक से आगे की दो भ्रूमिकाएँ होती है, इस आशय से कहते हैं । पाँच भ…
  12. Verses 14–16यदि इस भूमिका में पदार्थो की भावना नहीं होती है, तो देहयात्रा कैसे सम्पन्न होगी ? इस पर क…
  13. Verse 17हे श्रीरामचन्द्रजी, जो महापुरुष सातवीं भूमिका को प्राप्त हो गये हैं, वे आत्माराम और महात्…
  14. Verse 18जीवन्मुक्त पुरुष सुख-दुःख में निमग्न नहीं होते । केवल देहयात्राके लिए छठी ओर सातवीं भूमिक…
  15. Verse 19करते हैं या नहीं भी करते, इस कथन से किसी को उनके यथेष्टाचार की शंका न हो जाय, इसलिए यथेष्…
  16. Verses 20–21आसक्तिरहित व्यवहार से पुरुष को सुख-दु:ख की प्राप्ति नहीं होती, इसको दृष्टान्तपूर्वक कहते…
  17. Verses 22–23ये सात ज्ञानभूमिकाएँ विद्वानों को ही प्राप्त होती हैँ । पशु, स्थावरादि अथवा म्लेच्छादिचित…
  18. Verse 24जो लोग यद्यपि दूसरी-तीसरी भूमिकाओं में या चौथी भूमिका में ज्ञान का उदय होने से आवरण का ना…
  19. Verses 25–28उद्योगशील हैं
  20. Verse 29इन्द्रियों के साथ मन पर विजय पाना ही सव शत्रुओं की जयो से उत्कृष्ट जय है, स्वात्मसाम्राज्…
  21. Verse 30इन भूमिकाओं में जिनकी जीत होती है यानी उत्कृष्ट स्थान होता है वे निश्चय ही महात्मा हैं, व…