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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verses 20–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

आत्मारामतया तांस्तु सुखयन्ति न काश्चन । जगत्क्रियाः सुसंसुप्तान्रूपालोकाः स्त्रियो यथा ॥ २० ॥ भूमिकासप्तकं चैतद्धीमतामेव गोचरम् । न पशुस्थावरादीनां न च म्लेच्छादिचेतसाम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

आसक्तिरहित व्यवहार से पुरुष को सुख-दु:ख की प्राप्ति नहीं होती, इसको दृष्टान्तपूर्वक कहते हैं। अपने आत्मा में रमण करने के कारण जगत्‌ के व्यवहार जीवन्मुक्तों को ऐसे ही सुख नहीं देते, जैसे कि गाढ निद्रा में सोये हुए पुरुषों को अत्यन्त सुन्दर रूपवाली स्त्रयो सुख नहीं देती हैं