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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 22-23

संस्कृत श्लोक

प्राप्ता ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छादयोऽपि ये । सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः ॥ २२ ॥ ज्ञप्तिर्हि ग्रन्थिविच्छेदस्तस्मिन्सति हि मुक्तता । मृगतृष्णाम्बुबुद्ध्यादि शान्तिमात्रात्मकस्त्वसौ ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

ये सात ज्ञानभूमिकाएँ विद्वानों को ही प्राप्त होती हैँ । पशु, स्थावरादि अथवा म्लेच्छादिचित्तवाले (देहमें आत्मबुद्धि करनेवाले) मनुष्यों को नहीं प्राप्त होती ॥ २ १॥ जो पशु (हनुमान्‌ आदि), म्लेच्छ (धर्मव्याध आदि) (प्रह्नाद, कर्कटी आदि असुर) भी इस ज्ञानदशा को प्राप्त हुए है, वे भी सदेह अथवा विदेह मुक्त ही हैं, इसमें संदेह नहीं है। चित्‌ और अचित्‌ की ग्रन्थि का विच्छेद ही ज्ञान है। उसके प्राप्त होने पर मुक्ति हो जाती है, क्योंकि मृगतृष्णा में जलबाद्धि, शुक्ति में रजतबुद्धि का जो वाघ है, तद्रूप ही वह हे