Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनार्थभावनात् । पदार्थाभावनानाम्नी षष्ठी संजायते गतिः ॥ १४ ॥ भूमिषट्रुचिराभ्यासाद्भेदस्यानुपलम्भतः । यत्स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥ १५ ॥ एषा हि जीवन्मुक्तेषु तुर्यावस्थेह विद्यते । विदेहमुक्तिविषयस्तुर्यातीतमतः परम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि इस भूमिका में पदार्थो की भावना नहीं होती है, तो देहयात्रा कैसे सम्पन्न होगी ? इस पर कहते हैं। चिरकाल तक दूसरे के द्वारा किये गये प्रयत्न से इसमें अर्थों की प्रतीति होती है, इसलिए पदार्थाभावनानामक यह छठी भूमिका कही जाती है । इस भूमिका में स्थित पुरूष ब्रह्मविद्वरीयान्‌ कहलाता है । पूर्वोक्त छः भूमिकाओं का बहुत दिनों तक अभ्यास होने से दूसरे के प्रयत्न से भी भेद की प्रतीति न होने से जो एकमात्र स्वरूप में स्थिति है उसे तुर्यगा नामकी गति यानी ज्ञानभूमिका जानिये । "तुर्य जाग्रदाद्यवस्थात्रयनिर्मुक्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते" (जाग्रद्‌ आदि तीन अवस्थाओं से रहित शिव, अद्वैत, चौथा तुर्य माना गया है) इस श्रुति से उस प्रकार के विद्वान्‌ के अनुभव से सिद्ध ब्रह्म को प्राप्त होता है यानी जिस अवस्था में आत्मरूप से अखण्ड ब्रह्म का अनुभव करता है, वह तुर्यगा अवस्था है उसको जो प्राप्त हो चुका, वह ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहा जाता है। उक्त ब्रह्मविद्वरिष्ठ ब्रह्मविद्‌, ब्रह्मविद्वर और ब्रह्मविद्वरीयान्‌ में चौथा है उसे यह अवस्था प्राप्त होती है, इसलिए यह तुर्यगा कहलाती है । यह तुर्यावस्था जीवनमुक्त पुरुषों में इसी देह में विद्यमान रहती है। इस अवस्था के बाद विदेहमुक्ति का विषय तुर्यातीत ब्रह्म ही है, अतः भूमिकाओं में उसकी गणना नहीं की जाती