Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसङ्गफलेन च । रूढसत्त्वचमत्कारात्प्रोक्ताऽसंसक्तिनामिका ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति इन चार ज्ञानभूमिकाओं के अभ्यास से बाह्य और आभ्यन्तर विषयाकारों से और उनके संस्कारों से असम्बन्धरूप समाधिपरिपाक से चित्त में वृद्धि को प्राप्त हुआ निरतिशयानन्द, नित्य अपरोक्ष, ब्रह्मात्मभावसाक्षात्कार रूप चमत्कार जिसमें उत्पन्न हुआ है, ऐसी पाँचवीं ज्ञानभूमिका असंसक्ति नाम की कही गई हे । यद्यपि उत्तम अधिकारियों को द्वितीय भूमिका में भी शब्दजन्य अपरोक्षज्ञान से साक्षात्कार होना प्रसिद्ध है तथापि पाँचवीं भूमिका में द्वैत संस्कार के अत्यन्त उच्छेद से उत्पन्न अत्यन्त उत्कर्ष का ओर चतुर्थ भूमिका के अन्तमें उत्पन्न साक्षात्कार की पाँचवीं भूमिका में दुढतरता की उपपत्ति का सूचन करने के लिए 'रूढ़' चमत्कार का विशेषण है। अतएव चौथी भूमिका के अन्त में कहीं पर पाँचवीं भूमिका को प्राप्त हुआ पुरूष ब्रह्मविचार कहलाता है । इस ज्ञानभूमिका में अविद्या ओर अविद्या के कार्यों का संसर्ग बिलकुल नहीं रहता, अतएव यह असंसक्ति नाम की भूमिका कही जाती है