Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 96
पंचानबेवाँ सर्ग समाप्त छियानबेंवाँ सर्ग पाषाणोपाख्यान के तात्पर्य के रूप मेँ चिति का विवर्तरूप जगदभ्रम और अजर अमर चितिरूप आत्मा ही ब्रह्मानन्द है, यह वर्णन।
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- Verse 1विस्तार से वर्णित पाकणोपाख्यान को सर्वश्रष्ठ प्रक्रत आत्मविक्य मे घटाते हैं / श्रीवसिष्ठज…
- Verse 2भद्र, किसी भी काल में कहीं भी कुछ भी वस्तु स्थित नहीं है, किन्तु अखण्ड यथास्थित ब्रह्म ही…
- Verse 3जगत् चैतन्यमात्र का विवर्त है, यह सवको अपने-अपने स्वप्न के अनुभव से सिद्ध है, यह कहते है…
- Verse 4जैसे स्वप्न आत्मा का विवर्त हैं, कैसे ही समस्त जगत् ब्रह्मात्मा का विवर्त है, यह जानना च…
- Verse 5यदि जयत् ब्रह्म का विवर्त हो तो परमार्थ्रष्टि से क्या स्थित ह 2 इस पर कहते हैं । न तो स्…
- Verse 6द्ष्टान्त में भी यह बात समान है, यह कहते हैं / जैसे स्वप्न में नगरादिरूप होकर भी चिन्मय आ…
- Verse 7जितनी सृष्टियाँ हैं; उन सवका जो अनुभव होता है, उस्र चिति की बराबर अनुव्रत होती है, इससे भ…
- Verse 8जो भी कुछ है, वह केवल चिति ही है, सृष्टि नहीं । सुवर्णं के विकार कटकादि स्थल में वास्तव म…
- Verse 9जैसे स्वप्न में एकमात्र निर्विकार आत्मचिति ही पर्वत के सदृश भासती है, वैसे ही निराकार विक…
- Verse 10चिन्मात्र निर्मल एवं निर्लेप आकाशरूप यह आत्मा नाश रहित, जन्म रहित तथा बुद्धि आदि विकारों…
- Verse 11जीवरूपी पुरुष चेतनरूप निर्मल आकाश ही है, अतः ये आप चिदाकाशरूप हैं, भँ अजर चिदाकाशरूप हूँ…
- Verse 12यदि शरीर में चिदाकाश न रहे तो वह निर्जीव ही हो जायेगा । यह चिदाकाश काटा नहीं जा सकता, जला…
- Verse 13भद्र, इन सब कारणों से न कुछ मरता है और न कुछ उत्पन्न होता है । चिति में प्रकाशन स्वभाव है…
- Verse 14विति का मरण या भ्रेदन मानने में कोई प्रमाण नहीं है ओर यदि मानोगे तो सभी का मरण हो जायेगा,…
- Verse 15एक ही भ्रूतात्मा प्रत्येक श्रुत में स्थित ह“ इस श्रुतिप्निद्धान्त के अनुच्मार थ्रूतात्मा…
- Verse 16श्रीरामजी, आज तक किसी भी स्थान में किसी का भी चिन्मात्रस्वरूप मरा नहीं है और चेतन से शून्…
- Verse 17. इस स्थिति में वेतनात्या के परिज्ञान से ही जन्म-मरणादविरुप अनर्थ की निवृत्ति छिद ह यह कह…
- Verse 18भद्र, में निर्मल चेतनमात्ररूप हूँ, इस तरह के आत्मा के अनुभव का जो पुरुष कुतर्कों से खण्डन…
- Verse 19मैं चेतनरूप हूं, गगन से भी अति स्वच्छ हूँ, सनातन हूँ, व्यापक हूँ और सब तरह के विकारों से…
- Verse 20मैं आकाश के सदृश निर्मल निर्लेप केवल चेतनस्वरूप हूँ, ये शरीर आदि अनर्थ मेरे होते कौन हैं…
- Verse 21मैं चिदाकाशरूप स्वच्छ ब्रह्मात्मा हूँ, इस तरह का विस्पष्ट अनुभव जिस पुरुष का नष्ट हो गया…
- Verse 22मैं ज्ञानस्वरूप ब्रह्मात्मा ही हूँ, मेरे देह, इन्द्रिय होते कौन हैं ? इस तरह के अपरोक्ष ज…
- Verse 23चिन्मात्ररूपी विशुद्ध आत्मा को पकड़कर जो पुरुष अचल बनकर स्थित है, उस महापुरुष को मानसिक प…
- Verse 24जो पुरुष अपने चेतन स्वभाव को भूलकर तुच्छ शरीर में आस्था बोधकर बैठे हैं, उन्होने असली सोने…
- Verse 25मैं देहरूप ही हूँ, इस भावना से पुरुष का बल, बुद्धि और तेज नष्ट हो जाता है और मैं चेतनात्म…
- Verse 26मैं आकाश के सदृश अतिस्वच्छ विशुद्ध परमात्मारूप हूँ, मेरे जन्म-मरण ही क्या ? इस प्रकार की…
- Verse 27चिदाकाश को छोड़कर दूसरे दूसरे तुच्छ स्थूल आदि देहो को जो पुरुष अलग से सत्यरूप आत्मा समझकर…
- Verse 28मैं न तो छेदा जाता हूँ, न मैं जलाया जाता हूँ, मैं वज के सदृश दृढ़ चेतन मात्र स्वरूप हूँ,…
- Verse 29भद्र, बड़ा ही आश्चर्य का विषय है कि पण्डितो को भी मोह-व्यामोह देखा जाता है, इसीलिए वे शरी…
- Verse 30मैं चिदाकाशस्वरूप ही हूँ, इस प्रकार का परमार्थ सत्यरूप भाव जब स्थिर हो जाता है, तब वज़पात…
- Verse 31मैं अमर चिदात्मारूप नहीं हूँ, देहरूप हूँ, इसीसे नष्ट हो रहा हूँ, यों समझकर पुरुष जो रोदन…
- Verse 32यह सदा अपरोक्षरूप चेतनरूप ही मैं हूँ, देह आदि दृश्यरूप मैं नहीं हूँ, इस प्रकार के निश्चय…
- Verse 33मेँ चेतनात्मक आकाश हूँ, मेरे विनाश का कोई भी सटीक हेतु नहीं है, सारा जगत् चेतन -सत्ता से…
- Verse 34हम लोग चेतन से अन्य हैं; ऐसा जो कहते हैं; वे क्या चैतन्य युक्त होकर कहते हैं अथवा चेतन्य…
- Verse 35ओर यदि चैतन्य अपना मरण देखता है, यह माना जाय तो वह सदा ही अपना मरण देखा करेगा, ऐसी स्थिति…
- Verse 36यों जब मरण ही अप्रग्तिद्ध है, तब उससे भिन्न जीवन की भी कल्पना व्यर्थ है वह आशय रखकर कहते…
- Verse 37अविनाशी चेतन के अनुसार ही सबको वस्तुओं का अनुभव होता हैं, उससे विरुद्ध ग्रकार से नहीं; यह…
- Verse 38चिति संसार देखती है, मुक्ति देखती है, और सुख भी जानती है, इतना होने पर भी अपने स्वरूप से…
- Verse 39तब बन्ध और मोक्ष में विशेष किस बात को लेकर है इसे बतलाते हैं / चिति अपने असली स्वरूप को न…
- Verse 40किसी समय कोई कुछ भी न तो नष्ट होता है और न पैदा ही होता है, क्योंकि जो भी कुछ है, वह सभी…
- Verse 41इन सब बातों से निचोड़ यह निकला कि जयत् के अनेक रुपों में सत्यता या असत्यता केवल अपने-अपन…
- Verse 42कथित अर्थ का निगमन करते हुए उफसलार करते हैं / श्रीरामजी, इस जगत् में पुरुष भ्रान्ति से ज…