Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रममरं नाहं यन्नश्यामीति रोदिति ।
अनष्ट एव तद्देहो जातापूर्वा खरोलिका ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं अमर चिदात्मारूप नहीं हूँ, देहरूप हूँ, इसीसे नष्ट हो रहा हूँ, यों समझकर पुरुष जो रोदन
करता है, उसका वह रोदन तो आत्मा के नष्ट न होने पर ही होता है, इसलिए विवेकी की दृष्टि से
नट के सदृश रोदनविडम्बना एक परिहास का खेल ही है, दूसरा कुछ भी नहीं