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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

चेतनं वर्जयित्वान्यत्किंचिद्यूयं जना यदि । यदुच्यतां महामूढाः स्वात्मा किमपलप्यते ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

हम लोग चेतन से अन्य हैं; ऐसा जो कहते हैं; वे क्या चैतन्य युक्त होकर कहते हैं अथवा चेतन्य स शून्य होकर कहते हैं; पहला पक्ष लेते हैं; तो अपना वेतन स्वभाव जानकर केला कहना ही नहीं बनता / यदि दूसरा पक्ष लेते हैं; तो जो बेतन्य से शून्य हैं; वे हम अचेतन हैं; इसका अनुभव या अपलाप, अधिक क्या कहें किसी का भी अपलाप नहीं कर सकते, इस आशय से कहते हैं / यदि चेतन के स्वरूप को छोड़कर और अन्य किसी जड़रूप पदार्थ बनकर मनुष्य प्रश्न करते हैं तो आप उनसे कहिए कि हे महाभूत, अपनी आत्मा का अपलाप क्यों करते हो ?