Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अहं वेदनमात्रात्मा कानि देहेन्द्रियाणि मे ।
लब्धात्मानमिति स्वच्छं प्रविलुम्पन्ति नापदः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं ज्ञानस्वरूप ब्रह्मात्मा ही हूँ, मेरे देह, इन्द्रिय होते कौन हैं ? इस तरह के
अपरोक्ष ज्ञान को प्राप्त कर चुकनेवाले, अविद्यादि मलों से निर्मुक्त अतएव अतिविशुद्ध हुए पुरुष
को मरण आदि आपदाएँ नष्ट नहीं कर पातीं