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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

हेमहेमाश्मनोः स्वप्नपुरचेतनयोर्यथा । भेदो न संभवत्येव न भेदश्चितिसर्गयोः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जितनी सृष्टियाँ हैं; उन सवका जो अनुभव होता है, उस्र चिति की बराबर अनुव्रत होती है, इससे भी यह निश्वय होता हैं कि विति ही जग्रत्‌ के रुप से स्थित हैं, यह कहते हैं । जैसे सुवर्ण और सुवर्ण-पत्थर का (सुमेरु पर्वत पर सुवर्णपत्थर प्रसिद्ध है) अथवा स्वप्न नगर और स्वप्न द्रष्टा आत्मा का परस्पर कभी भेद नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही चिति और सृष्टि का भी परस्पर कभी भी भेद नहीं हो सकता