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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

न स्वयंभूर्न च जगन्न स्वप्नपुरमस्त्यलम् । स्थितं संविन्महादृष्ट्या ब्रह्म चिन्मात्रमेतया ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जयत्‌ ब्रह्म का विवर्त हो तो परमार्थ्रष्टि से क्या स्थित ह 2 इस पर कहते हैं । न तो स्वयंभू की (समष्टि हिरण्यगर्भं की ) स्थिति है, न जगत्‌ की स्थिति है, न स्वप्न- नगर की ही असली स्थिति है, किन्तु इस परिपूर्ण आत्मदृष्टि से केवल चिन्मात्र ब्रह्म की ही स्थिति विद्यमान है