Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 89
अद्ठासीवाँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग भूमि की धारणा से चिदाकाश में देखा गया यह भूमण्डल तथा सम्पूर्ण जगत् मनोमात्र है, यह वर्णन।
25 verse-groups
- Verse 1श्रीरामभद्र ने कहा : गुरुवर, कौतुक से अपनी आत्मा में सकल जगतो को देखने के लिए प्रवृत्त हु…
- Verse 2काल्पनिक दृष्टि से या तात्विक द्रष्ट से यदि विचारा जाय, तो उक्त दो प्रश्नों में कोर्ड भेद…
- Verse 3दूसरे श्लोक में पूर्वार्ध स़रें जो कहा, उका ग्रतिज्ञापूर्वक समर्थन करते हैं / यदि आप सत्…
- Verse 4भद्र, मैं शुद्ध चिदाकाश ही हूँ, उस चिदाकाशरूप मुझमें जो चिदात्मा का कुछ स्फुरण हो जाता है…
- Verse 5वह (प्रसिद्ध) मन, वह भूमण्डल, वह जगत् और वह (प्रसिद्ध) पितामह ये सबके सब चिदाकाश में, आक…
- Verse 6इस तरह वह जो कुछ मैं बन गया, वह सब मेरा संकल्प था, अतः वह विस्तृत मनोरूप ही रहा । केवल धा…
- Verse 7कुछ देखा जाता है, उसका स्वरूप अन्ञानियों की दृष्टि से प्रणिद्ध स्वरूप नहीं हो सकता, इस आश…
- Verse 8यदि अमूर्त विदाकाश का स्फुरण ही इस तरह का यह सक कुछ हैं, तब वह मूर्तरूय इवप्रत्यय को (साक…
- Verse 9भद्र, यह भूमण्डल स्थिर, अत्यन्त कठोर, अतिविस्तारवाला है, इस प्रकार की बुद्धि, आकाश में नी…
- Verse 10हे रघुवर “घट आदि तो केवल वाणी के ही विकार हैं, वास्तव में तो वे कुछ नहीं है, मिट्टी रूप ह…
- Verse 11इकंप्रत्ययलब्धत्वात् (इ्दं व्यवहार से उसका अनुभव होने से) इस उक्ति को स्पष्ट करते हैं /…
- Verse 12हे रामजी, चितिरूपी बालक का [ब्रह्माजी का) त्रिजगत्, यह भूतल आदि सब दृश्य भी सदा एक मनोरा…
- Verse 13चिद्रूप आत्मा का संकल्प चिद्रूप से भिन्न नहीं है, इसलिए जगत् तन्मय ही है। वस्तुतः जगत्…
- Verse 14अन्ञानियों की द्रष्ट से यदि निष्कर्ष निकालें, तो यह जगत् अज्ञातचितिरुप ठहरता हैं और तत््…
- Verse 15किस तरह का ज्ञान हो जानेपर जगत् वेतनमात्ररूप बन जाता है इस पर कहते हैं / सब कुछ चारों ओर…
- Verse 16जैसे वैडूर्य आदि मणि कुछ व्यापार न करती हुई भी स्वभावतः शुक्ल, पीत आदि किरणों का निर्माण…
- Verse 17नेति नेति“ इत्यादि श्रुति का पर्यालोचन द्वारा उपहार करते हैं / चूँकि चेतनरूप आत्मा न कुछ…
- Verse 18निरन्तर चिदाकाश ही महीतल के सदृश भासता है, तलभावशून्य चिदाकाश ही अपने स्वरूप में स्वभावतः…
- Verse 19प्रसिद्ध यह यथास्थित जगत् और वह धारणाकल्पित जगत् दोनों एकमात्र आत्मा का स्वाभाविक स्फुर…
- Verse 20विति के विवर्तभाव में धारणाकल्पित (समाधिकल्पित) श्रूमण्डल और यह ग्रव्यक्ष शूमण्डल दोनों ह…
- Verse 21यह प्रसिद्ध भूतल चिदाकाशमात्ररूप है मेरी धारणा से कल्पित भूतल भी चिदाकाशमात्ररूप है। परन्…
- Verse 22श्रीरामजी, भूत, भविष्यत् ओर वर्तमान कालमें होने वाले त्रैलोक्य का समस्त भूतजाल केवल भ्रा…
- Verse 23हे प्रिय, जो हो चुके हैं, जो होनेवाले हैं तथा जो वर्तमान में हैं, वे सभी भूमण्डल स्वाधिष्…
- Verse 24वे सत्तासामान्यरूप हैं, इसी कारण वे ओर उनके भीतर विद्यमान सब वस्तुएँ मैं ही हूँ, यों धारण…
- Verse 25हे श्रीरामजी, चिन्मात्ररूप, जरावस्था से शून्य यह परमात्मतत्त्व ही अबोधकाल में अपनी शुद्धर…