Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
पार्थिवीं धारणां बद्ध्वा जगन्ति समवेक्षितुम् ।
संपन्नस्त्वमसौ भूमिलोकः किमुत मानसः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामभद्र ने कहा : गुरुवर, कौतुक से अपनी आत्मा में सकल जगतो को देखने के लिए
प्रवृत्त हुए आप पार्थिव धारणा बांधकर क्या हम लोग जिस मिड़ीपाषाणादिरूप भूलोक को देख
रहे हैं, तद्रूप हो गये अथवा मनोमात्रमय यानी मनोराज्य के सदृश मृत्तिकादिशून्य स्वप्नमय
भूलोक हो गये ? यह कहिये
सर्ग सन्दर्भ
अद्ठासीवाँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग भूमि की धारणा से चिदाकाश में देखा गया यह भूमण्डल तथा सम्पूर्ण जगत् मनोमात्र है, यह वर्णन।