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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इदं च मानसं चाहं संपन्नः पृथुभूतलम् । नेदं न मानसं नैव संपन्नो वस्तुतस्त्वहम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

काल्पनिक दृष्टि से या तात्विक द्रष्ट से यदि विचारा जाय, तो उक्त दो प्रश्नों में कोर्ड भेद ही नहीं है, यह सूचित कर रहे श्रीकधिष्टजी उक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यदि आप काल्पनिक दृष्टि से पूछते हैं, तो आपकी दृष्टि से मिट्टी, पत्थर आदि रूपसे प्रसिद्ध जो भूमण्डल है, वही केवल मनका विकार होने से मानस भी है, इसलिए मैं जो विस्तृत भूमण्डलरूप हो गया, वह मानस और यह प्रसिद्ध-दोनों रूप ही बन गया था । यदि आप तात्त्विक दृष्टि से पूछते हैं, तो वास्तव में न तो मैं मानसरूप हुआ और न प्रसिद्ध जगद्रूप ही हुआ था