Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अमानसं महीपीठं न संभवति किंचन ।
यदसद्वेत्सि यत्सद्वा मनोमात्रकमेव तत् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे श्लोक में पूर्वार्ध स़रें जो कहा, उका ग्रतिज्ञापूर्वक समर्थन करते हैं /
यदि आप सत् मानते हैं या यदि असत् मानते हैं, दोनों ही पक्षों में यह भूपीठ कुछ भी अमानस
हो ही नहीं सकता । यह केवल मनकी कल्पना ही है, क्योंकि मनके अस्तित्व में ही उसमें अस्ति-
नास्ति कल्पना होती है