Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
दृश्यमस्त्यपरिज्ञातं परिज्ञातं न विद्यते ।
परिज्ञातं तदेवास्य शृणोषि यदिदं चिरम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्ञानियों की द्रष्ट से यदि निष्कर्ष निकालें, तो यह जगत् अज्ञातचितिरुप ठहरता हैं और
तत््वद्रष्टि से निष्कर्ष निकालें; तो शुद्ध बिन््मात्ररूप ही ठहरता है, इस आशय से कहते हैं /
यह दृश्य अपरिज्ञात चेतनमात्ररूप है और चेतनका परिज्ञान हो जाने पर तो कुछ भी नहीं है ।
तत्त्व का ज्ञान हो जाने पर तो तत्त्व वस्तु ही इसका स्वरूप बन जाती है। भद्र, इसका मैं दीर्घकाल
से उपदेश दे रहा हूँ ओर आप उसे सुनते भी हैं, फिर आप क्यों प्रबुद्ध नहीं होते ?