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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

नेदं भूमण्डलं तद्वै तदन्यद्धि मनोमयम् । आकाशमात्रकचनमचेत्यं कचनं चितेः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ देखा जाता है, उसका स्वरूप अन्ञानियों की दृष्टि से प्रणिद्ध स्वरूप नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं / भद्र, वह मानस भूमण्डल मिट्टी, पत्थर आदिरूप यह भूमण्डल नहीं है, उससे विलक्षण मनोमय है, चिदाकाशमात्र का स्फुरण है, चितिका अचेत्य (चेत्यभिन्न) स्फुरण है