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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

तदेवाकाशमात्रात्म तथाभूतं चिरं स्थितम् । इदं प्रत्ययलब्धत्वान्मानसत्वं समुज्झति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि अमूर्त विदाकाश का स्फुरण ही इस तरह का यह सक कुछ हैं, तब वह मूर्तरूय इवप्रत्यय को (साकार यह व्यवह्ारको) कर्यो धारण करता है, इस पर कहते हैं / चिदाकाशमात्रस्वरूप होता हुआ वह दीर्घकालतक वैसा ही स्थित रहता है, धारणा के अभ्यास से पुष्ट होकर जब इदम्‌" (यह) व्यवहार से उसका अनुभव होने लगता है तब वह मानसत्वका (मनोमयरूपता का) परित्याग कर देता है । सारांश यह है कि स्वप्न आदि में केवल मानसरूप अतएव अस्थूल पृथ्वी आदि का जाग्रत के सदुश 'इदम्‌” व्यवहार से ही अनुभव होता है, इसलिए उनमें मनोमयता रहने पर भी तिरोहित हो जाती है, इस स्थिति में दूध जब दघधिरूपमें बन जाता है, तब उसमें जैसे दूध स्वरूपता का अनुभव नहीं होता, वैसा यहाँ मानसत्वका अनुभव नहीं होता, यह नहीं कहना चाहिए, किन्तु यही कहना चाहिए कि, तरंग, कुण्डल एवं साड़ी के रूपमें ही जैसे जल, सुवर्ण एवं कपासरूपता है, वैसे ही यहाँ पर मानसत्व है ही, किन्तु उक्त व्यवहार के बलसे वैसा अनुभव नहीं होता, यह जानना चाहिए