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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 77

छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सतहत्तरवाँ सर्ग॑ पुष्करावर्तक मेघ की वृष्टिधारा से जर्जर एवं सात समुद्रौ के विक्षोभ से धोये गये जगत्‌ का पुनः वर्णन।

49 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, युगक्षय में जब पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु-इन चार महाभूतो का…
  2. Verse 2श्रीरामजी, उस समय तीनों जगत्‌ उड़ रहे तमालवन के सदृश उड़ रहे भस्मरूप अभ्र-से भासुर हो गये…
  3. Verse 3गीले काष्ठ आदि के जलने से उनमें कुछ धूप्रयुक्त नील ज्वालाएँ उठ रहीं थी, इन नील ज्वालाँशों…
  4. Verse 4भद्र, उस त्रिलोकी में चारों ओर घनघोर वृष्टि का व्यापक जयघोष हो रहा था, वृष्ट के कारण आर्द…
  5. Verse 5ने उसमें अपना एक अच्छा स्थान बना लिया
  6. Verse 6ब्रह्माण्डभित्ति की अन्तिम सीमा तक हो रहे भांकार शब्दों से अति भीषण वायु के गमनों से आकाश…
  7. Verse 7उस समय वहाँ यह हालत रही कि जल, अग्नि एवं वायु का जो विविध ताण्डव हो रहा था उससे बड़े-बड़े…
  8. Verse 8आकाश में खम्भों के सदृश जल की अन्धाधुन्ध-अविच्छिन्न- धाराओं की वर्षा द्वारा जो कल्पान्त अ…
  9. Verse 9भद्र. उस समय त्रिलोकी के सारे समुद्र नदियों के समूहों से परिपूर्ण हो रहे थे जिनमें गंगाजी…
  10. Verse 10उस समय त्रिलोकी में जो कल्पान्त मेघ बरस रहे थे, उन मेघो के आधार-पीठका तमालवृक्ष के पत्तों…
  11. Verse 11उस समय पर्वतां के ऊपर से जो नदियों के समूह बह रहे थे, उनसे बड़े- बड़े पर्वत, द्वीप एवं नग…
  12. Verse 12ग्रह और तारों का समूह बड़ा ही उग्र एवं व्यग्र प्रतीत हो रहा था, ये एक दूसरे पर प्रहार करन…
  13. Verse 13भद्र, सारे त्रैलोक्य मे उस समय चारों ओर बहनेवाले प्रचण्ड पवन के कारण उत्पन्न हुए जल के पर…
  14. Verse 14घने जल कणों से युक्त वाष्प के मेघों से तथा कल्पकालीन नीलवर्णं के मेघो से सारी त्रिलोकी मे…
  15. Verse 15श्रीरामभद्र, पर्वतो का आधारषीठ जो भूतल था वह तो एकदम जीर्ण -शीर्णं होकर खण्ड-खण्ड हो चुका…
  16. Verse 16उठ रही तरंगो से ऊपर आकाश की ओर फेंक दिये गये पत्थरों द्वारा मेघो को छिन्न-भिन्न कर देनेवा…
  17. Verse 17ब्रह्माण्डभित्तिरूपी वक्षःस्थल में चोट पहुँचाने वाले, कठोर टंकारसहित प्रलय कालीन मेघ के स…
  18. Verse 18जल के अभाव से मरुस्थल के समान हो गये अधोभागवाले अन्तरिक्ष में स्थित हो रहे यानी उड़ रहे स…
  19. Verse 19तीनों लोक में प्रलयकालीन वायु द्वारा वेल्लित हुए मरे, अधमरे, जले तथा अधजले अंगों वाले देव…
  20. Verse 20“अर्जुन वात" यह एक वातरोग विशेष का नाम है । जिसे यह रोग होता है उस रोगी को यह रोग आकाश मे…
  21. Verse 21कल्पान्त पवन से उड़ाये जा रहे शिला-समूहों से जो प्रहार हो रहा था उससे लोकान्तरं के तटग्रा…
  22. Verse 22सम्पूर्ण जगत्‌ कल्पान्त के प्रचण्ड पवनों के संगठनों से उत्पन्न पर्वतो की गुफाओं के भांकार…
  23. Verse 23असुरो के समान घोर कर्कश शब्द करनेवाले वायुओं के द्वारा उड़ाये जा रहे वन समूह में संसृष्ट…
  24. Verse 24उस समय त्रैलोक्य आकाशमण्डल में नगर, जिले, दैत्य, अग्नि, असुर, नाग एवं आदित्यो के समूहों क…
  25. Verse 25भद्र, उस समय तीनों जगत्‌ का स्वरूप इस तरह दिखाई दे रहा था-बड़े-बड़े विशाल पर्वत नष्ट हो र…
  26. Verse 26उस समय जल के पर्वताकार तरगों के आघातों से दिक्पालों के नगर कुटे जा रहे थे ओर देव, दैत्य,…
  27. Verse 27प्रशान्त अंगारों के सदृश भासमान पर्वत आदि बड़े-बड़े पदार्थो का वायुओं के द्वारा ऐसे निःसा…
  28. Verse 28जिनकी भित्तयो घूम रही थीं, ऐसे देव ओर दैत्यों के नगरों को.जो मेघों के जल के सदुश रत्नों स…
  29. Verse 29सारा आकाशमण्डल तो गिर रहे लोगों से युक्त सातों लोकों के घरों से तथा सागरो के सदृश चक्रों…
  30. Verse 30आकाशमण्डल में जीर्ण शीर्णं पत्तों के समूहो के सदृश चंचल वायुओं के द्वारा वेल्लित अतएव गिर…
  31. Verse 31भद्र, आकाश से झनझन शब्दपूर्वक गिर रहे सुवर्ण, स्फटिक, वैटूर्यमणि एवं नीलम आदि के मन्विरों…
  32. Verse 32उस समय धूम्र और भस्म के मेघ उठने लगे, वृष्टि के जल से पुरो के समूह आ गिरने लगे, बड़ी-बड़ी…
  33. Verse 33आवर्त के सदुश घर-घर ध्वनि करनेवाले ओर परस्पर विदलन करने में उद्यत प्रौढ पर्वत, समुद्र में…
  34. Verse 34भद्र, शिष्ट ओर देवगण उसमें क्रन्दन कर रहे थे, थोडे से जीवन से युक्त दया के पात्र प्राणी र…
  35. Verse 35पवनां के द्वारा उड़ाये गये मृत ओर अर्धमृत जीव-समूहों से, जो ठीक जीर्णं पत्तों के समान थे,…
  36. Verse 36उस समय सम्पूर्ण त्रैलोक्य पर्वत शिखरो के सदृश मोटी-मोटी गिर रही जलधाराओं के निर्झरों से आ…
  37. Verse 37उस समय जगत्‌ में अनेक शाखा-प्रशाखाओं में विभक्त अग्नि शमशम शब्दपूर्वक शान्त हो रही थी और…
  38. Verse 38उस काल मेँ समस्त जगत्‌ नदियों में मिली हुई तृणराशि के सदृश समुद्र मेँ मिले हुए बड़े-बड़े…
  39. Verse 39भद्र, उस समय त्रिलोकी में वृष्टि शान्त हो जाने के कारण अग्नि से उत्पन्न भस्म की गन्ध से द…
  40. Verse 40भद्र, उस समय निरर्गल नाद का उल्लास हो रहा था, त्रिलोकी में सृष्टि का लोप हो जाने से क्रमश…
  41. Verse 41अथवा सवा ही सृष्टि ग्रे और सृष्टिलोप से युक्त है, इस आशय से कहते हैं / भद्र, अथवा यह जगत्…
  42. Verse 42भद्र, अधिक क्या कहें, सारे जगत्‌ में लुआठों के एक दूसरे के साथ हुए आघातं से अग्निचूर्णं ओ…
  43. Verse 43उस समय सातवें पाताल तक जगत्‌ अपने स्थान से च्युत द्वीप एवं सागरो से युक्त भूमण्डल के बड़े…
  44. Verse 44नीचे सातवें पाताल तक, मध्य में भूमण्डल तक प्रलयवायुओं के द्वारा सारा जगत्‌ पूर्णरूप से एक…
  45. Verse 45हे श्रीरामजी, तदनन्तर वह अकेला महासमुद्र धीरे-धीरे शीघ्रगामी सैकड़ों नदियों के द्वारा जल…
  46. Verse 46भद्र, तदनन्तर पहले तो मुसल के आकार में, फिर खम्भे के आकार में और फिर तालवृक्ष के आकार में…
  47. Verse 47तदनन्तर नदी प्रवाह के उग्र जलपात के सदृश जलपात करनेवाली तथा सातं द्वीपों से युक्त भूपीठ क…
  48. Verse 48उक्त महावृष्टि से दाह करनेवाली अग्नि ऐसे शान्त हो गई, जैसे शास्त्र एवं सज्जनों की संगति स…
  49. Verse 49हे श्रीरामजी, जिसमें ऊपर और नीचे भ्रमणशील अनेक पदार्थ थे, भीतर जलकणों के कारण पर्वतरूपी म…